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‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान

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राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद ने 15 सितंबर, 2017 को कानपुर जिले के ईश्वरगंज गांव से ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान का शुभांरभ किया। राष्ट्रपति महोदय ने स्वच्छता ही सेवा की शपथ दिलवाई। इसके तहत राष्ट्र ने एक स्वच्छ, स्वस्थ और नए भारत के निर्माण का संकल्प लिया। उपस्थित जन समुदाय को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा, ‘भारत स्वच्छता और आरोग्य के लिए निर्णायक लड़ाई लड़ रहा है। स्वच्छता केवल सफाईकर्मियों और सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं हैं यह एक ऐसा राष्ट्रीय आंदोलन है जिसमें बहुपक्षीय हित जुड़े हुए हैं।’

महात्मा गांधी का एक मशहूर कथन है, ‘स्वच्छता, राजनीतिक स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण है।’ यह कथन समाज में स्वच्छता के महत्व को रेखांकित करता है। इन शब्दों से प्रेरित होकर प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त, 2014 को लाल किले के प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था कि हमें गंदगी और खुले में शौच के खिलाफ लड़ाई लड़नी है, हमें पुरानी आदतों को बदलना है और महात्मा गांधी के 150वीं जयंती के वर्ष 2019 तक स्वच्छ भारत का लक्ष्य प्राप्त करना है। उन्होंने आगे कहा कि हमारे गांवों में महिलाओं का गौरव एक महत्वपूर्ण विषय है। खुले में शौच समाप्त होना चाहिए। शौचालयों का निर्माण होना चाहिए और उनका उपयोग होना चाहिए।

स्वच्छ भारत मिशन 02 अक्टूबर, 2019 तक एक स्वच्छ और खुले में शौच से मुक्त भारत के लक्ष्य को हासिल करना चाहता है। इस लक्ष्य के कारण शौचालयों के निर्माण में बढ़ोतरी हुई है और इसका उपयोग करने वालों की संख्या भी बढ़ी है। इससे लोगों में स्वच्छता के प्रति बेहतर व्यवहार को बढ़ावा मिला है। ठोस और द्रव कचरा प्रबंधन से भी स्वच्छता को बढ़ावा मिला है। स्वच्छ भारत मिशन के लिए वित्तीय आवंटन में निरंतर वृद्धि हुई है। यह आवंटन 2014-15 में 2,850 करोड़ रुपये था जो 2015-16 में बढ़कर 6,525 करोड़ रुपये हो गया। 2017-18 के लिए यह आवंटन 14,000 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है। पिछले तीन वर्षों में स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत 48,264,304 शौचालयों का निर्माण हुआ है। खुले में शौच से मुक्त गांवों की संख्या बढ़कर 2,38,966 हो गई है। व्यक्तिगत शौचालयों का कवरेज 2014 के 42 प्रतिशत से बढ़कर 2017 में 64 प्रतिशत हो गई है। पांच राज्यों ने अपने को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया है। पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने कहा है कि अक्टूबर, 2019 तक खुले में शौच से मुक्त भारत बनाने का लक्ष्य प्राप्त करने के संदर्भ में यह प्रगति उत्साहवर्धक है।

स्वच्छ भारत मिशन, स्वच्छता प्रक्षेत्र में सुधार चाहता है। इसका प्राथमिक फोकस लोगों में व्यवहार के बदलाव से संबंधित है जिसे खुले में शौच से मुक्ति का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए मूलभूत उपकरण के रूप में माना जा सकता है। बुजुर्गों, दिव्यांगजनों, छोटे बच्चों और महिलाओं की मासिक धर्म की विशेष जरूरतों को ध्यान में रखते हुए स्वच्छ भारत मिशन के तहत सार्वजनिक और सामुदायिक शौचालयों को डिज़ाइन किया गया है। यह डिज़ाइन स्वच्छ भारत मिशन के समावेशी दृष्टिकोण को दर्शाता है। इसके अलावा मिशन लिंग संवेदी सूचनाएं, शिक्षा, संचार/व्यावहारिक बदलाव भी प्रचारित करना चाहता है। मिशन ने 2017 में लिंग संबंधी और 2015 में महिलाओं के मासिक रजोवृत्ति संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

निगरानी और मूल्यांकन की नई प्रणाली प्रारंभ की गई है। ग्रामीण भारत के लिए किए गए स्वच्छ सर्वेक्षण से यह पता चला है कि हिमाचल प्रदेश का मंडी तथा महाराष्ट्र का सिंधुदुर्ग भारत के सबसे स्वच्छ जिले हैं। स्वच्छ सर्वेक्षण में 22 पर्वतीय जिलों और 53 मैदानी क्षेत्रों को शामिल किया गया था। राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी के लिए निजी कंपनियों की सेवाएं ली गई जिसने स्वच्छता कवरेज के संदर्भ में नमूना-आधार का उपयोग किया और पूरे देश में खुले में शौच की वास्ताविक स्थिति का आकलन किया।

पूरे देश में 92,000 घरों और 4,626 गांवों को शामिल करते हुए एक विशाल सर्वेक्षण किया गया। इसके अतिरिक्त गंगा के किनारे स्थित 200 गांवों का भी सर्वेक्षण किया गया। अभिताभ बच्चन को स्वच्छ भारत मिशन का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया और लोगों को प्रेरित करने के लिए सचिन तेंदूलकर व अक्षय कुमार जैसे लोकप्रिय व्यक्तियों को सहभागी बनाया गया। लोगों को जागरूक बनाने के लिए सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्मों का उपयोग किया गया। एक न्यूजलेटर, ‘स्वच्छता समाचार पत्रिका’ भी प्रकाशित की जा रही है। स्वच्छ भारत मिशन के विषय पर आधारित बॉलीवुड फिल्म, ‘टॉयलेट- एक प्रेम कथा’ ने भी बॉक्स ऑफिस पर काफी सफलता हासिल की है।

स्वच्छ भारत मिशन एक राष्ट्रीय आंदोलन है जिससे केन्द्रीय मंत्रालय, राज्य सरकार, स्थानीय संस्थाएं, गैर-सरकारी और अर्ध-सरकारी एजेंसियां, उद्योग जगत, गैर-सरकारी संगठन, धार्मिक समूह, मीडिया आदि कई हित समूह जुड़े हुए हैं। यह दृष्टिकोण प्रधानमंत्री के उस वक्तव्य पर आधारित है जिसमें उन्होंने कहा था कि स्वच्छता केवल सफाई विभाग की नहीं वरन् प्रत्येक व्यक्ति की भी जिम्मेदारी है।

कई तरह की पहले और परियोजनाएं प्रारंभ की गई है। अंतर-मंत्रिस्तरीय परियोजनाओं में स्वच्छता पखवाड़ा, नमामि गंगे, स्वच्छता कार्य योजना, स्वच्छ-स्वस्थ-सर्वत्र अभियान, स्कूल स्वच्छता अभियान, आंगनवाडी स्वच्छता अभियान, रेलवे स्वच्छता जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। अंतर-क्षेत्रीय सहयोग में स्वच्छ विख्यात स्थान, उद्योग जगत की भागीदारी, परस्पर धर्म सहयोग, मीडिया अनुबंध और संसद अनुबंध जैसे कार्य शामिल हैं। 76 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों में  स्वच्छता कार्य योजना को विकसित किया गया है। इंटरनेट आधारित पोर्टल बनाए गए हैं ताकि  प्रगति की निगरानी की जा सके और कार्यान्वयन स्थिति को रेखांकित किया जा सके। महिला स्वच्छग्राहियों की नियुक्तियां की गई और कार्यक्रम में महिलाओं की साझेदारी बढ़ाने के लिए ‘स्वच्छ शक्ति’ पुरस्कारों की घोषणा की गई। स्वच्छ भारत की सफलता के समाचार बताते हैं कि शौचालयों के निर्माण ने ग्रामीण लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं क्योंकि उनमें रात के अंधेरे में खुले में शौच जाने की बाह्यता नहीं रह गई है। इसके अतिरिक्त घर में शौचालय निर्माण से खुले में शौच से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों में भी अत्यधिक कमी आई है।

उपराष्ट्रपति महोदय ने कहा कि स्वच्छ भारत मिशन एक ऐसा बिन्दू है जिसे एक विशाल जन-आंदोलन में परिणत किया जा सकता है। ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान लोगों को संगठित करना चाहता है ताकि वे गांधी जयंती तक चलने वाले स्वच्छता पखवाड़े के दौरान श्रमदान करके इस मिशन से सीधे तौर पर जुड़ सकें।

                                         आइए और ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान से जुड़िए।

                                                                               ***

 *वी. श्रीनिवास 1989 बैच के आईएएस ऑफिसर है जो वर्तमान में राजस्थान टैक्स बोर्ड के अध्यक्ष के तौर पर कार्यरत हैं।

लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।

 

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Jaridih East panchayat is ODF thanks to Mukhia Kanchan Devi

Kanchan Devi left her home in Kanpur when she was married to a man from Jaridih East panchayat in Bermo Block of Bokaro District in Jharkhand. The first shock the school teacher received was finding that her husband’s home had no toilet. However, being a submissive daughter-in-law she suffered in silence as she went out in the early hours with other women to defecate in the open. In time, she got used to the idea. However, the deep sense of shame and embarrassment she felt, never truly left her.

About a decade ago, it was a practice for water carriers to deliver a few gallons of water to each home in the village.  The water so distributed was never sufficient and method of distribution was not sustainable. Kanchan was one among those who resolved to find a solution to the problem. Considering that their gram panchayat was situated on the banks of River Damodar, they found a way to draw the river water into a tank and used a motor to provide regular water supply to all homes.

Her drive and enthusiasm got her elected as a Mukhiya in 2010 for the first time and again for a second time of the panchayat that was home to 859 households.

When the mother of 4 learnt about the Swachh Bharat Mission (Gramin) after listening to the PM himself, as he spoke at the Red Fort on August 15, 2014, Kanchan felt incredibly motivated. How wonderful it would be for all homes to have toilets, she thought as ideas ran through her mind.

Being a person who is fiercely determined to do or get what she wants, she got in touch with the district administration. She got all the residents of the village to participate in the awareness building and triggering sessions and encouraged everyone to build and use toilets. Every opportunity she got, she conveyed to them the link between open defecation and disease as she urged them to follow safe sanitation practices.

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Kanchan was also instrumental in building two community-toilet complexes to cater to those families who lived on rent and to the landless. One of them is close to the river bank and the other near the market place. She has also put in place a system for solid waste management. Currently there are 8 mobile garbage bins at strategic places that are used to collect waste from homes. Such waste is then segregated. While the non-biodegradable waste is sent for recycling the other waste is dumped in a common landfill.

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Today, the panchayat enjoys 100% sanitation coverage. The Mukhiya also ensures that sanitation is maintained in her village. Further, residents of the village regularly approach her for any problems such as those relating to water supply or garbage and she is able to effectively address those issues.

Courtesy: Swachh Bharat Mission

India Is Winning Its War on Human Waste

Author: Bill Gates xVAFH9ZH_400x400.jpg

Nearly three years ago, Indian Prime Minister Narendra Modi made one of the boldest comments on public health that I have ever heard from an elected official. It’s still having a big impact today.

He made the comment during his first speech to the nation commemorating India’s Independence Day. Modi said: “We are living in the 21st century. Has it ever pained us that our mothers and sisters have to defecate in the open? The poor womenfolk of the village wait for the night; until darkness descends, they can`t go out to defecate. What bodily torture they must be feeling, how many diseases that act might engender. Can`t we make arrangements for toilets for the dignity of our mothers and sisters?”

I can’t think of another time when a national leader has broached such a sensitive topic so frankly and so publicly. Even better, Modi backed up his words with actions. Two months after that speech, he launched a campaign called Clean India (“Swachh Bharat” in Hindi), which now includes ending open defecation nationwide by 2019, installing 75 million toilets throughout the country—75 million!—and making sure that no untreated waste is dumped into the environment.

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On my most recent visit to India, I made a short virtual-reality video about this amazing undertaking:

If you’re wondering why the Prime Minister would put a spotlight on a subject that most of us would rather not even think about, take a look at the statistics. Of the 1.7 million people worldwide who die from unsafe water, sanitation, and hygiene each year, more than 600,000 are in India. A quarter of young girls there drop out of school because there’s no decent toilet available. When you factor in the deaths, sickness, and lost opportunity, poor sanitation costs India more than $106 billion a year.

In other words, solving this problem will save hundreds of thousands of lives every year, help girls stay in school, and boost the country’s economy. Improving sanitation is a big focus for our foundation, and we’re working closely with the Indian government in support of its goals.

There are two keys to achieving the targets of Clean India. One involves giving everyone access to a well-managed toilet, which means all the waste is treated (either on-site or in a treatment facility) to remove the pathogens that make people sick. It’s crucial to get the entire process right, from containing the waste in a toilet to collecting it, transporting it if necessary, and treating it. If one link in the chain fails, people still get sick.

Unfortunately, in many places, it’s not feasible to lay down sewer pipes or build treatment facilities. That’s why Indian researchers are testing a variety of new tools, including redesigned toilets that don’t require sewer systems and advanced ways to treat human waste.

So far, the progress is impressive. In 2014, when Clean India began, just 42 percent of Indians had access to proper sanitation. Today 63 percent do. And the government has a detailed plan to finish the job by October 2, 2019, the 150th anniversary of Mahatma Gandhi’s birth. Officials know which states are on track and which are lagging behind, thanks to a robust reporting system that includes photographing and geotagging each newly installed toilet.44.JPG

But giving people access to toilets isn’t enough. You also have to persuade them to use the toilets. That’s the second key to Clean India, and in some ways it is even harder than the first. People can be reluctant to change old habits.

Clean India has ingenious ways of tackling that problem. In some communities, groups of children band together to call out people who are defecating in the open and encourage them to use public toilets instead. In a pilot project that will be expanded next year, the government worked with Google so users in 11 cities could search online for the nearest public toilets, get directions, and read reviews by other users. On streets throughout the country, billboards remind passers-by of the mission. Stars from Bollywood films and cricket teams speak out on TV and radio. Even India’s currency features the Swachh Bharat logo.

The hard work is paying off. Today more than 30 percent of Indian villages have been declared free of open defecation, up from 8 percent in 2015. (You can track the progress on this handy dashboard.)

What I love most about Clean India is that it identified a big problem, got everyone working on it, and is using measurement to show where things need to be done differently. As the old saying goes, What gets measured gets done. If you don’t set ambitious targets and chart your progress, you end up settling for business as usual—and in this case, business as usual would mean poor sanitation keeps killing more than half a million Indians every year.

By aiming high, the people of India are demanding change, and they are taking action to make it happen. It is a great example for other countries and an inspiration for all of us who believe everyone deserves a chance at a healthy, productive life.

Courtesy: Swachh Bharat Mission Blog

 

स्‍वच्‍छता पखवाड़े से ‘स्वच्छता भारत अभियान’ को बढ़ावा मिलेगा

i201791801*नीरज वाजपेयी

पूरे देश में मनाये जा रहे स्‍वच्‍छता पखवाड़े से स्‍वच्‍छ भारत अभियान को नई गति मिली है। स्‍वच्‍छता और साफ-सफाई को विशेष बल देने वाले सरकारी कार्यक्रमों से आम लोगों की जागरूकता में कई गुणा बढ़ोतरी हुई है। यहां तक कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग भी पिछले तीन वर्षों में स्‍वच्‍छता और साफ-सफाई को लेकर ज्‍यादा जागरूक हुए है।

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प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने 2014 में गांधी जयंती के अवसर पर इस महत्‍वाकांक्षी अभियान का शुभारंभ किया था। इसके बाद से स्‍वच्‍छता को लेकर कई सुखद और सफल समाचार हमारे समक्ष आये है। सुरक्षित पेयजल और साफ-सुथरे शौचालय के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है और इससे स्‍वच्‍छता को एक नया अर्थ मिला है।

अभियान के तहत बड़ी संख्‍या में शौचालयों का निर्माण हुआ है और पेयजल की व्‍यवस्‍था में सुधार हुआ है। साफ-सफाई के कार्यक्रम नियमित रूप से चलाये जा रहे है। अभियान के बढ़ते महत्‍व का अंदाजा नये शौचालयों की संख्‍या, सरकारी विभागों द्वारा दिये जाने वाले प्रोत्‍साहन, सामाजिक संस्‍थाओं व आम लोगों की भागीदारी से लगाया जा सकता है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक स्‍वच्‍छता का एक निश्चित स्‍तर हासिल करने से 50 हजार रूपये प्रति वर्ष प्रति परिवार बचाये जा सकते है।

पूरे भारत में चलने वाले इस अभियान के अंतर्गत बड़ी संख्‍या में शौचालयों का निर्माण हुआ है और जहां से भी इस संबंध में शिकायतें आई है, उसका शीघ्र निदान करने की कोशिश की गई है।

सार्वभौमिक स्‍वच्‍छता को गति प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने स्‍वच्‍छ भारत मिशन की शुरूआत की है। इसके अंतर्गत दो उप मिशन है :- एसबीएम (ग्रामीण) और एसबीएम (शहरी)। इस मिशन का उद्देश्‍य 2019 तक स्‍वच्‍छ भारत के लक्ष्‍य को प्राप्‍त करना है। यह महात्‍मा गांधी के 150वीं जयंती पर एक सच्‍ची श्रद्धांजलि होगी।

अधिकारियों के अनुसार एसबीएम की शुरूआत के समय देश में स्‍वच्‍छता कवरेज 39 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 67.5 प्रतिशत हो गई है। 2.38 लाख गांवों को ‘खुले में शौच से मुक्ति’ के अंतर्गत लाया जा चुका है और इस उपलब्धि को स्‍वतंत्र एजेंसियों ने भी अनुमोदित किया है।

स्‍वच्‍छता से संबंधित समस्‍याओं के निदान के लिए स्‍वच्‍छताथॉन का आयोजन किया गया, ताकि लोगों के नये विचार सामने आ सकें। स्‍वच्‍छ भारत मिशन का लोगो भी लोगों द्वारा दिये गये विचार (क्राउड सोर्स) पर ही आधारित है।

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स्‍वच्‍छ भारत अभियान को नई ऊर्जा देने और इसे जनांदोलन बनाने के लिए ‘स्‍वच्‍छता ही सेवा’ नाम से इस पखवाड़े के दौरान स्‍वच्‍छता अभियान चलाया जा रहा है। इसके अंतर्गत जन प्रतिनिधि और अन्‍य लोग श्रमदान करेंगे। राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस अभियान का कानपुर देहात से शुभारंभ किया। उपराष्‍ट्रपति वेंकैया नायडू कर्नाटक में इस अभियान को नेतृत्‍व प्रदान करेंगे।

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स्‍वच्‍छता पखवाड़े की समाप्‍ति गांधी जयंती के दिन होगी। इस अवसर पर बड़ी संख्‍या में केंद्रीय मंत्री, संसद सदस्‍य और विधानसभा सदस्‍य श्रमदान करेंगे। प्रधानमंत्री के जन्‍म दिन 17 सितम्‍बर को ‘सेवा दिवस’ के रूप में मनाया गया। स्‍वच्‍छता मिशन के महत्‍व को बढ़ाने वाले इन कार्यक्रमों के कारण आम लोगों में भी इस कार्यक्रम के प्रति जागरूकता बढ़ी है।

नीति निर्माताओं का कहना है कि जनप्रतिनिधियों, विख्‍यात व्‍यक्‍तियों और ब्रांड एम्‍बेसेडरों की सहभागिता के द्वारा हम जनता को एक महत्‍वपूर्ण संदेश देना चाहते हैं। DJ1c48vV4AMebHjलोगों में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्‍य से ‘सेवा दिवस’ के अवसर पर ‘टॉयलेट-एक प्रेम कथा’ का दूरदर्शन पर प्रसारण किया गया।

स्‍वच्‍छता ही सेवा’ अभियान के तहत समाज के सभी क्षेत्रों के लोगों की श्रमदान के प्रति सहभागिता बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। स्‍वच्‍छता, शौचालय निर्माण और खुले में शौच से मुक्ति को विशेष महत्‍व दिया जाएगा। सार्वजनिक स्‍थानों और पर्यटन स्‍थलों में सफाई अभियान चलाये जाएगें। इस कार्यक्रम की देखरेख पेयजल और स्‍वच्‍छता मंत्रालय करेगा।

कार्यक्रम के महत्‍व को बढ़ाने और इसे लोकप्रिय बनाने के लिए प्रत्‍येक अवसर का उपयोग किया जा रहा है। सत्‍तारूढ़ पार्टी के विचारक और समाज सुधारक डॉ. दीनदयाल उपाध्‍याय की जयंती (25 सितम्‍बर) के अवसर को ‘सर्वत्र स्‍वच्‍छता’ के रूप में मनाया जाएगा। इस मौके पर सार्वजनिक स्‍थानों जैसे पार्क, बस स्‍टैंड, रेलवे स्‍टेशनों आदि पर स्‍वच्‍छता कार्यक्रम चलाये जाएगे।

गांधी जयंती के अवसर पर पर्यटन स्‍थलों पर स्‍वच्‍छता कार्यक्रम चलाये जाएगे। एक अनुमान के मुताबिक पर्यटन स्‍थलों पर स्‍वच्‍छता की कमी के कारण प्रति वर्ष 500 करोड़ रूपये की हानि होती है। विश्‍व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक स्‍वच्‍छता की कमी के कारण भारत को प्रति वर्ष अपने जीडीपी के 6 प्रतिशत का नुकसान होता है।

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सरकार ने बड़ी संख्‍या में ऐसे स्‍थानों को चि‍न्हिृत किया है, जहां सफाई की आवश्‍यकता है। प्रत्‍येक मंत्रालय को स्‍वच्‍छता के लिए विशेष कार्यक्रम चलाने का निर्देश दिया गया है। रक्षा मंत्रालय यह सुनिश्चित करेगा कि प्रत्‍येक छावनी खुले में शौच से मुक्‍त हो। इसके बाद मं‍त्रालय पहाड़ों पर स्थित ऊंचाई वाले स्‍थानों में स्‍वच्‍छता कार्यक्रम चलाएगा। सूचना और प्रसारण मंत्रालय स्‍वच्‍छता कार्यक्रमों को लोकप्रिय बनाने के लिए निजी समाचार चैनलों और एफएम रेडियो स्‍टेशनों का उपयोग कर रहा है। इसके अतिरिक्‍त मंत्रालय इस विषय पर लघु फिल्‍में भी बना रहा है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार एसबीएम ने कई लक्ष्‍य हासिल कर लिये है। 29,79,945 घरेलू शौचालयों का निर्माण हुआ है। घर-घर जाकर कचरा एकत्र करने की व्‍यवस्‍था 44,650 वॉर्डों में शत-प्रतिशत रूप से की गई है।

स्‍वच्‍छ भारत शहरी पोर्टल के मुताबिक 2,19,169 सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण हुआ है। कचरे से विद्युत निर्माण की क्षमता 94.2 मेगावाट हो गई है। 1286 शहर ‘खुले में शौच से मुक्ति’ के दायरे में आ चुके है।

एसबीएम ग्रामीण पोर्टल के मुताबिक 2 अक्‍तूबर, 2014 से अब तक 4,80,80,707 घरेलू शौचालयों का निर्माण हुआ है और 2,38,539 गांवों को ओडीएफ (खुले में शौच से मुक्ति) घोषित किया गया है। 196 जिलों को ओडीएफ घोषित किया जा चुका है। एसबीएम का एक महत्‍वपूर्ण लक्ष्‍य ओडीएफ है। नीति आयोग के आकलन के मुताबिक 2019 तक ओडीएफ के लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने के लिए 55 मिलियन घरेलू शौचालय और 1,15,000 सामुदायिक शौचालयों के निर्माण की आवश्‍यकता होगी। ‍सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, केरल, हरियाणा और उत्‍तराखंड ओडीएफ राज्‍य है। 2018 तक दस और राज्‍य ओ‍डीएफ की श्रेणी में आ जाएंगे। सभी 4500 नमामि गंगे गांव ओडीएफ की श्रेणी में आ चुके है।

 

स्‍वच्‍छ भारत अभियान के तहत कई कार्यक्रमों का संचालन किया जाता है। इसके तहत स्‍वच्‍छता इंडेक्‍स पर आधारित शैक्षणिक संस्‍थाओं, नगरों आदि की श्रेणी बनाई जाएगी। इस अभियान की वास्‍तविक सफलता आम लोगों से जुड़ी है। आम लोगों को सामाजिक और व्‍यक्तिगत साफ-सफाई के प्रति अधिक संवदेनशील होने की जरूरत है। हम यह आशा करते है कि सम्‍पूर्ण देश 2019 तक खुले में शौच से मुक्‍त हो जाएगा।

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लेखक यूनाइटेड न्‍यूज ऑफ इंडिया के पूर्व संपादक है। अपने 30 वर्षों के कार्यकाल में उन्‍होंने कई महत्‍वपूर्ण राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय घटनाओं की रिपोर्टिंग की है। वे प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्‍य रह चुके है।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

समग्र प्रगति के लिए हाई-स्पीड कॉरिडोर में भारत का धमाकेदार प्रवेश

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भारत ने जहां एक ओर अपनी आजादी के 75 साल पूरे होने पर वर्ष 2022 में अपनी हीरक जयंती बड़ी धूमधाम से मनाने पर अभी से ही अपनी नजरें जमा ली हैं, वहीं दूसरी ओर एनडीए सरकार ने भारत में पहली बुलेट ट्रेन चलाने से संबंधित एक दशक पुराने सपने को साकार करने के लिए इस दिशा में बाकायदा ठोस शुरुआत कर दी है। इस दिशा में पहला सुदृढ़ कदम गुजरात के गांधीनगर में 14 सितंबर को तब उठाया गया जब भारत के दौरे पर आए जापान के प्रधानमंत्री श्री शिंजो आबे और भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने देश की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई और देश के प्रतिष्ठित शहर अहमदाबाद के बीच 508 किमी लंबी पहली हाई-स्पीड रेल परियोजना की नींव रखी।

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श्री मोदी ने इस रेल परियोजना के महत्व एवं खासियत, विशेषकर इसकी प्रथम विकास-उन्‍मुख विधा को संक्षेप में यह कहते हुए रेखांकित किया कि ‘बुलेट ट्रेन’ से राष्ट्र को जो बहुमूल्‍य लाभ होगा वह दरअसल ‘हाई-स्‍पीड कनेक्टिविटी से अधिक उत्पादकता’ के रूप में हासिल होगा। उन्होंने यह बिल्‍कुल सही कहा कि प्रतिष्ठित बुलेट ट्रेन उनकी सरकार की आंकाक्षा के अनुरूप वर्ष 2022 तक निर्मित होने वाले ‘नए भारत का प्रतीक’ होने के अलावा ‘गेम-चेंजर’ भी साबित होगी।

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इस परियोजना से देश भर में उत्पन्न उत्साह के माहौल को आगे भी अक्षुण्‍ण बनाए रखने और इस परियोजना पर काम शुरू होने के बाद आने वाली ढेर सारी चुनौतियों और असीम अवसरों पर प्रकाश डालने के लिए एक संक्षिप्‍त पृष्ठभूमि पेश की जा रही है। जापान सरकार से प्राप्‍त तकनीकी और वित्तीय सहायता के साथ मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल (एमएएचएसआर) परियोजना के कार्यान्वयन को मंजूरी दी गई है। इस परियोजना का क्रियान्वयन शुरू करने के लिए नेशनल हाई स्‍पीड रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड (एनएचआरसीएल) का गठन एक विशेष प्रयोजन वाहन (एसपीवी) के रूप में किया गया है। एक संयुक्त व्यवहार्यता रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है कि इस परियोजना को वर्ष 2022-2023 में शुरू करने का लक्ष्‍य रखा गया है। प्रधानमंत्री श्री मोदी देश की आजादी के 75वें साल यानी वर्ष 2022 में ही इस परियोजना को चालू करने को इच्‍छुक हैं, इसलिए परियोजना पूरी करने की समय सीमा एक साल घटा दी गई है।

महाद्वीपीय यूरोपीय देशों, जापान और चीन में हाई-स्पीड ट्रेनों के द्वारा किए जा रहे चमत्कारों को सुनने के साथ-साथ इसके गवाह रह चुके लोगों को अब बिल्‍कुल ठीक एक ऐसी ही आधुनिक ट्रेन के देश के प्रमुख शहरों से होकर गुजरने का अपना सपना सच होता प्रतीत हो रहा है। वैश्विक भू-राजनीतिक रुझान पर करीबी नजर रखने वाले कई विश्लेषकों का कहना है कि बर्फ से ढके माउंट फूजी के पास से बड़ी तेज रफ्तार से गुजरती प्लैटिपस जैसी नजर आने वाली और नीले एवं सफेद रंग की शिंकानसेन (जापानी बुलेट ट्रेन का नाम) की तस्वीर  जापान की लोकप्रिय सुशी के रूप में उसका अभिन्न अंग बन गई है। अक्टूबर 1964 से ही जब पहली बुलेट ट्रेन ने नया रिकॉर्ड बनाते हुए टोक्यो और वाणिज्यिक केंद्र ओसाका के बीच 582 किमी की दूरी को महज चार घंटे में ही तय कर लिया था (अब यह और भी घटकर सिर्फ दो घंटे 22 मिनट रह गया है), ‘शिंकानसेन’ विश्‍व युद्ध के बाद दुनिया में अपना आर्थिक वर्चस्व स्‍थापित करने वाले जापान की प्रतिष्ठित छवि के रूप में उभर कर सामने आई है। जापानी बुलेट ट्रेन इस द्वीपसमूह की इंजीनियरिंग दक्षता और सुरक्षा एवं समय की पाबंदी के अविश्वसनीय मानकों की एक मिसाल है। अब तक जापानी बुलेट ट्रेनों से दस अरब यात्री सफर कर चुके हैं। इस दौरान महज एक दुर्घटना या हताहत की नौबत आई है। यही नहीं, इस दौरान ट्रेन परिचालन में औसत देरी का रिकॉर्ड महज एक मिनट से भी कम अविश्‍वसनीय अवधि का रहा है।

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इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी बुलेट ट्रेन के जरिए सुनिश्चित होने वाली अपार दक्षता के जरिए अर्थव्यवस्था को मूल्य और दौलत के रूप में होने वाले बेशुमार लाभ को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं। यही कारण है कि इस परियोजना के शिलान्‍यास समारोह में श्री मोदी ने कहा कि हाई-स्‍पीड कॉरिडोर को समग्र आर्थिक विकास के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह दलील दी कि हवाई अड्डे तक पहुंचने,  इसके बाद उड़ान और फि‍र अंततः शहर में गंतव्य तक पहुंचने में लगने वाले कुल समय की तुलना में बुलेट ट्रेन लोगों को उनके गंतव्यों तक पहुंचाने में महज आधा समय ही लेगी। यही नहीं, इस दौरान लोगों को ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और सड़कों पर हिंसक झड़पों जैसी आम बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ेगा। इससे जीवाश्म ईंधनों की खपत  के मद में भारी-भरकम बचत भी संभव होगी।

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जहां तक जापान का सवाल है, उसने भारत में यह प्रतिष्ठित परियोजना बड़ी मुश्किल से जीती है क्योंकि वह भारत के साथ मित्रता को एक रणनीतिक लाभ के रूप में देखता है। इतना ही नहीं, यह जापान के लिए एक तरह से भू-राजनीतिक जीत भी है क्‍योंकि उसने सिर्फ 0.1 प्रतिशत ब्याज पर 12 अरब अमेरिकी डॉलर के ऋण की पेशकश करके चीन को पछाड़ दिया है, जिसे भारत को 50 वर्षों में अदा करना है। इससे परियोजना की अनुमानित लागत का 80 प्रतिशत से भी अधिक हिस्‍सा कवर हो गया है। इसके साथ ही जापान अपने वित्तपोषण के पूरक के तौर पर तकनीकी सहायता और प्रशिक्षण पैकेज भी सुलभ कराएगा।

भारत में बुलेट ट्रेन परियोजना को अवश्‍य ही एक नए परिप्रेक्ष्य से देखा जाना चाहिए। भारत की पहली ट्रेन ने काफी पहले वर्ष 1853 में बॉम्बे और ठाणे के बीच की 34 किमी दूरी लगभग एक घंटे में तय की थी। एक सदी के साथ-साथ कई दशक गुजर जाने के बाद भी भारतीय रेल की औसत गति प्रति घंटे 60 किलोमीटर ही है, जो दुनिया में सबसे कम गति में से एक है। यहां तक कि देश की सबसे तेज गति से चलने वाली ट्रेन ‘गतिमान’ भी 160 किलोमीटर प्रति घंटे की ही अधिकतम रफ्तार पकड़ पाती है। हालांकि, यदि आने वाले समय में देश के नीति निर्माताओं के आकलन के अनुसार ही सब कुछ होता है तो हाई-स्‍पीड ट्रेन इस अधिकतम गति की तुलना में दोगुनी से भी अधिक चरम रफ्तार से दौड़ेगी और इसके साथ ही वह ऐसे सभी भारतीयों की विश्वसनीयता और दिल जीत लेगी जो भारत को ढेर सारी सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण देश के रूप में तब्‍दील होते हुए देखना चाहते हैं।

बुलेट ट्रेन परियोजना को बकवास कहकर इसे कोसने वाले आलोचकों को यह समझना होगा कि हवाई, रेल और सड़क मार्गों वाले यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करने के अलावा हाई-स्पीड ट्रेन ऐसे लोगों के नए यातायात का भी सृजन करती है जो एक नवीन अनुभव के रूप में बेहद तेज रफ्तार के साथ आरामदायक और सुविधाजनक यात्रा का लुत्‍फ उठाना चाहते हैं। एक ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें निजी क्षेत्र की ओर से निवेश अत्‍यंत कम एवं धीमा है तथा सार्वजनिक निवेश का व्‍यापक भार उठाने पर सरकार विवश है, उसे देखते हुए यह भारत में आधुनिक बुनियादी ढांचे का निर्माण करने के लिए वैश्विक स्तर पर बहुतायत में उपलब्‍ध किफायती अधिशेष पूंजी का अनुकरणीय उपयोग करने का एक लाभप्रद तरीका है। संक्षेप में, यदि बेहतरीन अग्रिम योजनाओं और कठोर निष्पादन मानकों के जरिए शुरुआती मुसीबतों और प्रबंधकीय बाधाओं से पार पा लिया गया और बिल्‍कुल सटीक तरीके से पूर्व निर्धारित समय सीमा पर ही सब कुछ हासिल कर लिया गया तो हाई-स्‍पीड रेल परियोजना से भारतीय अर्थव्यवस्था को अपार लाभ होना तय है।

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*लेखक द हिन्दू ग्रुप के पूर्व डिप्टी एडिटर हैं और वर्तमान में आर्थिक मुद्दों पर स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

इस लेख में व्‍यक्‍त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।

 

 

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85,000 students vote on sanitation levels in their school, village

About 85,000 school students from 827 schools in the district of Ahmedabad in Gujarat voted on sanitation levels in their school, village and in their own personal hygiene at an event titled Swachhta Matdaan (voting for sanitation) organized on 8th April, 2017.

Ahmedabad was declared open defecation free (ODF) on 7th March, 2017.  Hence the voting exercise was a part of the verification exercise called ‘My village My rating.’

“The voting by students is expected to reveal not only the sanitation status of a school and village but also the changes in behaviour of people with regard to use of toilets, personal hygiene, etc.,” said Bhargavi Dave, District Development Officer, Ahmedabad.

It can be considered a verification of sorts as it would reveal the outcome of the efforts of various sanitation related activities carried out by the district over the past two years.  Ahead of the voting day, the DDO had written to Sarpanchs of all villages, 827 head teachers, 1492 Anganwadi workers, 1100 ASHA workers and 157 Block Resource Coordinators and Cluster Resource coordinators about the exercise, seeking their support and cooperation.

The ballot paper that each student had to mark contained points on school cleanliness, individual cleanliness and village cleanliness which they had to rate as – poor, average, medium, good or excellent.  For students, it was an engaging exercise where they opinion mattered, and was sought on cleanliness of the school – class room, toilet, drinking water facility, balcony, kitchen and school premises.

They also had to answer questions on their person hygiene – regular brushing of teeth, cleaning of tongue, combing of hair, cutting nails and washing hair on a weekly basis, washing hands after using a toilet and before meals.  This reinforcing of the sanitation message had students reflecting on their personal habits, knowing that it would have a bearing on their health.

Students felt a sense of belonging as they rated the cleanliness of their village, the public roads, the water bodies (well, rivers, chlorination of drinking water), village shops, market, garbage disposal methods, water troughs, milk booths, religious places, behaviour with regard to open defecation, etc.

Over the last couple of years, among the activities initiated by the District Administration as a part of the Swachh Bharat Mission Gramin were – Pad Yatra, Man Babavo Abhiyan (make up your mind and motivate society), providing access to toilets, 45 days hand washing Maha Abhiyan; Sakhi Mandal training for toilet construction, sanitary mart; inclusion of toilet construction and cleanliness in all mega social religious and national festivals; Nigrani and Gandhigiri, Natkhat Toli (students’ squad); launch of books on Swachh Bharat Mission such as; Sona nu Shochalaya (Book on hygiene with emphasis on toilet construction), village cleanliness and solid and liquid waste management) and Safai Katha (book on behaviour change and cleanliness).

“All these activities along with Swachhta Gita written by me and sung by my teachers, have contributed to a pro-cleanliness environment in all the 474 villages,” the DDO said.

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Courtesy: Swachh Bharat Mission Blog

How MP’s Narsinghpur became ODF

During the rainy season, Radha Bamnele (28) had to wade through knee-deep muck to find a suitable spot to answer nature’s call.  The predicament was similar for other women in the Khulri Panchayat that is home to about 4550 residents.  With all of them having access to toilets now, the women feel immensely relieved of a huge burden they were carrying.

“You cannot imagine the kind of problems we faced when we had no toilets.  Now it is wonderful to be living in clean conditions,” Radha said.  Her mother in law, Draupadi and sister in law Parvati expressed similar sentiments.  “We also feel that our health has improved considerably,” they said.

According to Pratibha Pal, CEO of the Zilla Panchayat in Narsinghpur District of Madhya Pradesh, women and children played a big role in motivating and sustaining the ODF drive.  “They are the biggest beneficiaries too,” she added.

Challenges

When the Swachh Bharat Mission campaign was started in the district comprising 1050 villages, 446 gram panchayats and 6 blocks, toilet coverage was barely 31%.  Needless to say, open defecation was rampant, particularly in the rural areas.

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Attitude:  People were of the opinion that it was normal and harmless to defecate in the open as it was a traditional practice passed down through the ages.  Even in families that owned toilets; some of them relieved themselves outdoors through force of habit.  They had a misconception that building a toilet in a residential premise was not good; and if a toilet was built, they felt it was meant for senior members or women.  Hence all people did not use it on a regular basis.  Further, they believed that building a toilet was the government’s responsibility and hence it was a low priority for them.    As for the leach pit technology, people felt the small pit would be filled soon and they would have a nasty problem of emptying the pit.  In contrast, defecating in the open amounted to freedom.

Public spaces:  Public places such as hotels and bus stands had no sanitation facilities whatsoever.  Considering that Narsinghpur has a lot of small sugar mills and the economy is chiefly based on agriculture, the area sees as many as 1.5 lakh migrant wage labourers during the cropping season each year.  Such labourers had no access to sanitation.

In addition, River Narmada flows through across 170 kms of the district, its banks prone to open defecation.  Each year, lakhs of pilgrims visit the area for various religious festivals and in the absence of sanitation facilities, have no alternative but to relieve themselves outdoors.

Two national highways pass through Narsinghpur that sees considerable traffic.  However, both drivers and passengers had no access to sanitation.  Under the circumstances, the district administration had to deal with geographical, social and economic issues besides lack of trained manpower in the process of generating demand for toilets.

Strategy

As far as implementation was concerned, the administration ensured strategic positioning of community led ODF campaign with holistic agenda for ensuring a clean and pure Narmada and a “Pawan Narsinghpur.”

They formed a District level resource team which comprised of line department officials and eminent personalities and developed a phased plan while engaging the common people, to take pride in creating a clean environment.  It began with a household survey to ascertain actual sanitation access in all households of the district which revealed the work that needed to be done and the resources required in terms of human resource, materials and funding.

Thereafter, the first phase of the campaign was initiated in one of the most populated blocks with a community approach and a target to achieve ODF status in 3 months.  This generated learnings for scaling-up the movement district wide.  It also underlined the specific role that had to be played by each department, based on the strength and capacity they had in reaching rural areas.

Foot soldiers: To undertake the massive job of community mobilization, an army of 175 sanitation motivators were engaged with a time bound GP wise plan for mobilisation.  Mainly youth with a commitment to change the society, they were foot soldiers employed to generate demand and improve service delivery.  Such youth were provided skills on tools and techniques to mobilize communities and facilitate collective decision for elimination of open defecation; and breaking customs of open defecation. This process helped in the identification of natural leaders – men, women and children who were made responsible to change mindsets and continue surveillance to create an ODF environment.

Supply chain management: Government engineers were deputed to facilitate easy availability of construction material and masons and ensure quality of toilet construction.  PRI functionaries were made accountable for speedy reporting and availability of funding. In addition, district and block level nodal officers were deputed for each GP to coordinate and monitor demand generation as well as supply chain.

Frontline workers like Anganwadi and ASHA workers took the lead and continuously strengthened the women surveillance committees to sustain the ODF environment. Children surveillance committees (vanersena or monkey brigade) emerged as effective change agents and took charge to demotivate open defecators through their early morning and evening follow-ups.

Convergent agenda:  The district administration chalked out a convergent agenda to ensure access to sanitation facilities at every possible public space.  Through the engagement of all departments especially revenue department it was mandated that all public places, road side restaurants/hotels/dhabas have toilets for people traveling or arriving in the district to prevent open defecation.  Owners of sugar mills and farmers were asked to build toilets for migrants labourers and ensure that they always used them.  Functionality of schools and anganwadi toilets were ensured through both departments.  This ensured that everyone coming to the district had access to a toilet.

Grievance redressal:  A system of regular reporting, reviewing was established with the deployment of nodal officers.  Constant review meetings were held to identify bottlenecks, grievances and issues hindering performance.  Solutions were found and timely redressals at each level were made. Social media like Whatsapp was used very effectively to monitor and provide real time support.

Monitoring and review systems:  A monitoring mechanism framework with specific indicators to continuously track and monitor the coverage, processes as well the outputs and outcomes was established with clear flow of information from villages to district level. Continues visits were undertaken by district nodal officers to the blocks and villages to review with various teams.

CLTS approach: Based on the learning and previous interventions and experiments across the State, it was decided to use community approach tools and techniques to mobilize a sense of disgust and shame of defecating in the open.  The approach integrated collective decision at community level as a first step to initiate implementation of sanitation plan in each of the villages.

In addition, to create an enabling environment for elimination of open defecation, sanitation motivators and frontline workers were trained and engaged at villages to continuously reinforce the open defecation free agenda at each level from Gram Sabha to schools and women meetings.   Activities in this regard included triggering among communities, schools and anganwadis; campaigns such as Kalash Yatra, walk of pride, walk of shame, hallabol, pawan yatra, ODF sports competitions, etc.  In all this, focus was on usage of toilets and sustainability; as development of local ownership was strengthened.

Motivating factors

The mission of achieving an ODF district and taking pride in doing so first and setting an example of implementing one of most difficult social change campaigns kept the team motivated, according to the CEO.  That ODF meant better health, nutrition and development, the team was well aware of.  In addition, there was enthusiastic involvement, of workers at all levels.

Success stories:

Hinotia village:  Durgaprasad Thakur (60) is happy that his family played a significant role in turning his village Hinotia, in Kareli block of Narsinghpur district, ODF within two months.  In his village, the surroundings are extremely clean and walls of almost all houses are painted with colourful slogans on the importance of sanitation.  Other than his home which is spick and span, the roads leading to the village, the banks of the canal that were prone to open defecation earlier, are now clean and free from litter.

According to Pratibha, when the local monitoring committee was formed, these two areas were targeted the most. Villagers formed groups to take rounds of the entire village, with particular focus on these two spots.  Thakur carried a stick with him and led the monitoring team.

As always, women and children played a very active role.  “We were always concerned about the safety of women and the embarrassment for them to defecate in open. So we ensured that every home got a toilet and everyone used them,” Suman Bai Thakur, an active member of the monitoring committee said.

Aakash Thakur, a student of class 8 always carries a green whistle.  “If I see anyone trying to break the rule, I whistle and inform the elders of the monitoring team,” he said.

Nidhi Mehra, a student of class 7 said that she is very happy that her village looks so clean.  Children do not fall ill as often now.

Munnibai, whose family had a toilet constructed in their agricultural field to ensure regular water supply, said that it is a relief to be able to use the toilet at any time. “It is extremely convenient and safe,” she said.

Arvind Mehra, the village sarpanch said that while most people cooperated in the process, some villagers had to be warned about penalty and stopping of pension and other benefits to convince them to give up open defecation.

Vimlesh Dubey, member of Janpad Panchayat said that achieving any social target becomes easy when people become committed to the cause. “Right from top officials to children in the village, everyone got totally involved in the process and achieved the ODF status in two months,” he said.

Rajiv Langhate, Janpad Panchayat CEO said that since the village had achieved the ODF status and was sustaining it through constant monitoring, a detailed project report had already been prepared for solid and liquid waste management in the village.

Sihora Gram Panchayat of Chawarpatha block:  A few months ago, Kalpana Shrivatava (22) wrestled each day with the problem of having to defecate in the open.  Along with her younger sister, who was pursuing her graduation, they would wake up early each morning before dawn and go quite some distance from their home to answer nature’s call.

“There was constant fear, discomfort as well as embarrassment. But it’s now a matter of the past. We cannot adequately express our happiness,” the young woman beams as she proudly shows the newly constructed toilet at her home.

Kalpana who is currently studying for an MA in Hindi literature is keen to clear her exams and secure a good job.  She does not let the fact that she lives in a remote village deter her from her ambition to become a government college teacher.

Like Kalpana, there are many other women who are smiling and resting easy in homes across 83 panchayats of the Chawarpatha block that became the first ODF block in the district on October 2, 2015 under the district’s ‘Paawan gram’ campaign under the Swachch Bharat Mission (rural) initiative.

Conclusion:

The achievement was not an easy task. The entire district administration machinery actively supported the community, and worked in mission mode for almost three months to ensure that every home in the block had a functional toilet and that residents used them effectively to end the blot of open defecation.

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Courtesy: Swachh Bharat Mission Blog

INDIA’S LEAP TO HIGH-SPEED CORRIDOR FOR HOLISTIC PROGRESS

G.Srinivasan* i201791501.jpg

As India will commemorate its diamond jubilee in 2022 to mark its 75 years of Independence, the NDA government has pulled up the socks to ensure that a decade-long dream of having the first bullet train in India is realized. The first step in this direction has been taken on September 14 in Gandhinagar, Gujarat when the visiting Japanese Prime Minister Mr. Shinzo Abe and India’s Prime Minister Mr. Narendra Modi laid the foundation stone for the maiden 508 km long high-speed rail project between Mumbai, the commercial capital and Ahmedabad, the iconic city of the country.

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Mr.Modi succinctly underscored the importance and significance of the rail project, the first of its growth-propelling genre, by remarking that “more productivity with high-speed connectivity” is what the nation would gain from the bullet train. He rightly stated that the prestigious bullet train will be a game-changer, besides being ‘a symbol of New India’ that his government seeks to build by 2022.

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A little background is in order to render the euphoria generated by this project across the country a bit enduring and to highlight the huge challenges and humongous opportunities ahead once the project is commissioned. Mumbai-Ahmedabad High Speed Rail (MAHSR) project has been sanctioned for implementation with technical and financial underpinnings from the Government of Japan.

National High Speed Rail Corporation Limited (NHRCL) has been incorporated as a Special Purpose Vehicle (SPV) to undertake the implementation of this project with a joint feasibility report contending that the project is targeted for commissioning in 2022-2023. With the Prime Minister Mr. Modi keen on commissioning the project on the occasion of the 75th year of the country’s independence in 2022, the project deadline is advanced by a year.

For people inured to hearing and witnessing the wonders wrought by high-speed trains in the continental European countries, Japan and China, the image of a similar modern train criss-crossing the country’s major cities is a dream come true. Many an analyst of global geopolitical trends say the picture of the platypus-snouted blue and white Shinkansen (the name of the Japanese bullet train) speeding past a snow-capped Mount Fuji has become a part and parcel of Japan as its popular sushi. Since October 1964, when the first bullet train broke the time it took to cover the 582 km between Tokyo and the commercial hub of Osaka to four hours (now it is down to two hours, 22 minutes), the Shinkansen has emerged as the iconic image of Japan’s post-war pinnacle to economic supremacy in the globe. The Japanese bullet train exemplifies the archipelago’s engineering efficiency and incredible standards of safety and punctuality.  So far, the Japanese bullet trains have carried ten billion passengers sans a single accident or casualty with an average enviable delay of less than one minute!

It is no wonder that the Prime Minister Mr. Modi is fully convinced of the worth and wealth it would bring forth to the economy through efficiency gains of unquantifiable amounts. That is why in the foundation-stone laying ceremony Mr. Modi said the high-speed corridor should be seen in the context of overall economic development. He contended that considering the time it takes to reach the airport and then take a flight and eventually reach the destination in the city, the bullet train would take half the time for people to reach their destinations, unhampered by any intervening and common obstacles such as traffic snarls, pollution and road rage. This would also spawn a lot of savings by reducing consumption of fossil fuels.

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For Japan, the prestigious project in India has been hard-won as it deems friendship with India a strategic gain and geopolitical victory of sort when it outsmarted China by offering a loan worth 12 billion US dollars at 0.1 per cent interest to be repaid by India over 50 years.

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This duly takes care of over 80 per cent of the project’s estimated cost. Japan would also supplement the financing with the  largesse of technical assistance and training package.

The bullet train project in India must perforce have to be viewed from a new perspective.  India’s first train way back in 1853 between Bombay-Thane covered the 34 km distance in about an hour. More than several decades later and a century, the average speed of the Indian Railways is among the slowest in the world at 60 kms per hour. Even the country’s fastest train Gatiman attains a top speed of 160 kms per hour.  But, if things swing according to the authorities’ calculations, the high-speed rail at its acme would operate at more than twice this celerity to win credibility and concurrence of many an Indian wishing to see a modern nation relishing panoply of comforts and convenience.    

For critics bashing the bullet train project as baloney, it needs to be dinned that over and above pulling traffic from air, rail and road, high-speed rail also generates new traffic with people weighing the comfortable and convenient mode of expeditious travelling as a new experience. In an economy plagued with low and slow investment from private sector with the government doing the heavy-lifting of public investment, this is a viable way of making exemplary use of low-cost surplus capital sloshing in abundance globally to build modern infrastructure in India. In fine, the high-speed rail project is bound to bring immeasurable benefits to the Indian economy if the teething troubles and managerial snafus get overcome through well-laid advance plans and rigorous executing standards and sticking to deadline milestones with metronomic precision.        

*  Author is a former Deputy Editor, The Hindu Group and is currently freelance commentator on economic issues.

 

Maa Narmada Mahotsav – A gratitude to lifeline

i201791302 *Jigar Khunt

Words of Narmada or Ganga bring images of entire life to our minds. As rivers, they reflect the flow of life too. Structuring rivers or life brings consistency, sustenance, productivity, and prosperity.

Shri Narendra Modi government at the center had been thinking on such structuring of rivers for the prosperous sustenance of life.

The Sardar Sarovar Dam has been the dream project of the Prime Minister Shri Narendra Modi. When he was the Chief Minister of Gujarat, he gave the utmost priority to the project. Despite hundreds of hurdles, he showed a strong political will to complete the project. He raised the funding for the project and earned the support from all stakeholders. It was during his time, that the Narmada water reached the water scarce Kutch region.

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On 12th June 2014, the 17th day after Shri Narendra Modi assumed the charge as Prime Minister, Narmada Control Authority (NOC) gave the approval to raise the height of the dam from 121.92 meters to 138.72 meters with the condition to keep the gates open. The state was eagerly waiting for this day for around 8 years then. The State government without waiting any further started the work of raising the height of the dam from the very next day and completed it six months before its actual schedule.

Then the Central government about three months back, on June 16, this year gave permission to the Gujarat government to shut the gates of the Sardar Sarovar dam with a spirit of rejuvenating rivers for the benefit of lives.This was about Fifty-six years after the foundation stone for the dam on the River Narmada was laid. This was expected to give an impetus to the holistic development of all the riparian states.

To commemorate this unprecedented moment and to mark such a measure of foresight and a complete commitment to development, the State government had decided to celebrate “Maa Narmada Mahotsav.” The Narmada is not just the longest river of the state, but it is the life line of Gujarat. The thirst of the largest part of the Gujarat is being quenched by Maa Narmada.

The Prime Minister is expected to participate in the culmination of this Mahotsav on coming Sunday, the 17th September 2017.

The closure of gates has increased the storage capacity of the dam by 3.75 times of its then capacity. 4,25,780 crore liters of water can be stored now, which earlier used to flow into the sea. In the year 2016-17, 320 crore units of electricity were generated. By using this additionally stored water, 40% more electricity can be generated. It will also save the state from the drought woes as stored water can now be diverted to the water scarce regions.

Maa Narmada Mahotsav

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The ‘Maa Narmada Mahotsav’ is currently going on from 6th September to 15th September. Under this Mahotsav, a chariot, named ‘Narmada Rath’ would move in 10,000 villages of 24 districts to spread awareness about the importance of the project and its benefits to around four (4) crore citizens of Gujarat. During these celebrations, Narmada Rath will be welcomed by Aarti and will also see the organisation of blood donation camps, slogan competitions, mobile film competitions, Mahila and Kisan Sabhas and cycle/bike rallies by youth. To take part in the celebrations, all people were invited to register on the website www.narmadamahotsav.gujarat.gov.in, launched by the Chief Minister of Gujarat Shri Vijay Rupani.

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Streamlining the Narmada waters

Three major schemes of Gujarat Government, which were inspired by the Spirit of Shri Narendra Modi, relating to Narmada river-namely Sauni Yojana, Sujlam Suflam Yojana and Sardar Sarovar Yojana are being taken forward for the development of the State. Due to these ambitious schemes, Narmada waters would now reach to the far-flung water deficient regions of the state which receives scanty rainfall.

Sauni Yojana is a project with an objective of filling 115 major dams by diverting flood waters overflowing from the Sardar Sarovar Dam across the Narmada River, to divert them to the drought prone areas of Saurashtra region.

The Prime Minister inaugurated the links 1, 2 and 3 of phase I of Sauni Yojana respectively in August 2016, April 2017 and June 2017. He will inaugurate the newly constructed gates of Narmada Dam and dedicate these to the nation during his visit to Gujarat on coming Sunday the 17th September 2017.

Under Sujlam Suflam Yojana, one million acre feet of flood waters of Narmada are to be provided to North Gujarat region by spreading canals and 14 pipelines. The approximate cost of the project is Rs. 4000 crore. Under this project, 697 reservoirs of 8 districts are to be filled with Narmada waters due to which approximately 1,88,600 acres of land would be benefitted.

Sardar Sarovar Yojana

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Sardar Sarovar Dam is a part of the Yojana by the same name and the dam is situated in Navagam, Dist. Bharuch which is 530 feet high from the sea surface. The idea of the dam was given by the iron man Sardar Vallabh Bhai Patel. The foundation stone of the dam was laid on 16th April 1961 and is completed in 17th June 2017. During this period, approximately Rs. 44,000 crores were spent on the construction of the dam and Rs. 16,000 crores were spent on bond and interest.

This project provides irrigation to 18 lacs hectare land of Gujarat and 2.46 lacs hectare land of Rajasthan. The project aims to benefit approximately 10 lakh farmers. 10 lakh job opportunities are expected to be created in the rural areas which will help to prevent the migration from rural to urban areas.

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Sardar Sarovar Dam is also a unique example of great engineering works. It is India’s biggest concrete gravity dam with 1210 meters length and 163 meters height from the foundation. Narmada’s main canal is world’s biggest canal with 458 km length and its water carrying capacity is 40,000 cubic feet per second. It has world’s first canal top solar power plant which saves land and reduces water evaporation from the canal. By interlinking of rivers, flood waters of Narmada have been diverted to the other rivers by its canals wherever possible in the state of Gujarat. Thus, in true sense, Sardar Sarovar Yojana became the source of inspiration for a transformation of the state.

Meanwhile, the Union Minister for Water Resources, River Development & Ganga Rejuvenation Shri Nitin Gadkari had announced that India’s first river-linking project will be executed between Maharashtra and Gujarat. Addressing newspersons in Mumbai recently, he said The Par – Tapi – Narmada and Damanganga – Pinjal Inter-State River Link project is expected to commence in next three months. Shri Gadkari said there are 30 river linking projects proposed nation-wide, which are expected to cost Rs.8 lakh crore.  Five of these will start in the next three months; two of those are in Maharashtra and Gujarat, he added.

Such a commitment and perseverance from leaderships of both the Central and State Governments should be a harbinger for the people of Gujarat to really celebrate this Mahotsav which is promising their welfare and development.

However, we must not stop just at worshipping the river. All the sections of the society must join hands with the government to make sure that the purity of our rivers is remained forever and must also rejuvenate the rivers which have lost the liveliness due to man-made interventions.

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*Author is working as Information Assistant in Press Information Bureau, Ahmedabad. Views expressed in the article are author’s personal.

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