Press Information Bureau

Government of India



Awareness & Action for Narmada Sanrakshan in Madhya Pradesh

Capture8It may be a marketing formula, but AIDA can – and does – work equally well in community participation. Awareness, Interest, Desire, Action (AIDA) are the four pillars on which the Madhya Pradesh Jan Abhiyan Parishad (MPJAP) decided to include the society in Environment and Water Conservation, Education and Health imperatives.

Invoking the religious sentiments of the local populace, MPJAP planned a public awareness campaign to educate the community about the importance of conservation, education and healthy habits. The campaign moved around a 30-day journey from Amarkantak to Sondwa and back by a core team of 150-200 persons. The yatra coordinated with workshops and public meetings that brought into focus activities like afforestation, sanitation, soil and water conservation, pollution control measures and promotion of organic farming.


Since rivers are the genesis of all civilisation, the strategy was to focus on rivers in Madhya Pradesh. The Narmada is the largest river of MP. It has its origin in the holy place of Amarkantak in Anuppur District, at the height of approx. 3467 ft. from sea level. It flows from east to west and merges with the Arabian Sea near Surat in Gujarat. This, the fifth largest river of the Indian subcontinent is the lifeline of Madhya Pradesh and Gujarat.

Narmada in Sanskrit means ‘Giver of Pleasure’. To the Hindus, the Narmada is one of the seven holy rivers of India; the other six being Ganges, Yamuna, Godavari, Saraswati, Sindhu and Kaveri. According to Hindu mythology, River Ganges acquired the form of a black cow and immersed in the holy water of river Narmada, to cleanse herself. There are several places of religious signicance along the Narmada such as Amarkantak, Maheshwar and Omkareshwar.

Many people undertake a pilgrimage along the river, which is called the Narmada parikrama.
Jan Abhiyan Parishad identified 313 small rivers 10-25 km long for their resurrection and conservation. With the help of groups of people, activities like desilting, deepening of the river and major plantations on the riverbanks were undertaken.

This approach to rejuvenate the river and protect the Panch Mahabhoot of Air, Earth, Ether, Fire and Water will denitely lead to a better, greener earth.

Digital AIIMS: A revolution for Healthcare

Capture5There can be no development without good governance, and it is the strong institutions that produce good governance. The Government of India is committed to promoting good governance and better service delivery to the citizens. The recently launched Digital India programme exemplifies this vision. In this direction, All India Institute of Medical Sciences (AIIMS), the premier Medical Institute of India, successfully
implemented e-Hospital Project and transformed into a fully digital public hospital.
AIIMS attracts nearly 40 Lakh patients per year from across the country.


The enormous patient load led to huge stress on the clinician’s work time and the long waiting time added to the woes of patients. Patients would stand in serpentine queues from 3.00 AM to get an appointment and spend nearly 9 hours in the hospital in chaotic conditions. There were difficulties in getting follow-up appointments too.

The Digital AIIMS initiative replaced the manual registration with electronic registration improved management practices by introducing Patient Registration Centre, 50 Registration Counters with e-Hospital Software, Waiting Halls to seat 5000 patients and creation of specialised cadres like the Nursing Information Specialists and Patient Care Coordinators. It placed OPD schedules of individual clinicians in public domain and simplified follow-up appointments by the creation of electronic patient records.


The Digital AIIMS Project garnered numerous laurels and letters of appreciation for its significance. The MoHFW recommended the project for replication in all 12 Central Government Hospitals. The Prime Minister commended the project in his
Independence Day address for pan-India replication.

Capture7It was awarded as the best performing project under Digital India by the Ministry of Information Technology. The team behind the project got the AIIMS Leadership Excellence Awards also.
The AIIMS Transformation Project represents India’s First Digital Revolution in Health Care. It is a remarkable success story. It has significantly contributed towards responsive public delivery systems by leveraging technology. The Digital AIIMS project has initiated a pan-India movement for the transformation of the large public hospitals into patient-friendly hospitals.


कृषि सुधार : राजग सरकार का अभूतपूर्व एजेंडा

rc*रमेश चंद

वर्ष 1970 से ही कृषि क्षेत्र में वार्षिक औसत विकास दर लगभग 2.8 प्रतिशत के आसपास स्थिर रही है। विशेष रूप से वर्ष 1991 के बाद गैर-कृषि क्षेत्र में तीव्र विकास दर के बल पर देश में आर्थिक सुधारों ने जोर पकड़ा है लेकिन कृषि क्षेत्र में यह विकास दर इसके बिल्‍कुल विपरीत है। इसके परिणामस्‍वरूप, 1990 के दशक के शुरुआत के बाद कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों की विकास दरों में विषमताएं तेजी से बढ़ी। इन विषमताओं के परिणामस्‍वरूप कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों के कामगारों की आय और किसानों तथा कृषि से भिन्‍न कामगारों की आय में भी विषमताएं बढ़ी। वर्ष 2011-12 के दौरान, कृषि क्षेत्र के एक कामगार की आय गैर-कृषि क्षेत्र के कामगार की आय का 5वां हिस्‍सा थी और एक किसान की आय गैर-कृषि क्षेत्र के कामगार की आय की तुलना में एक तिहाई ही थी। कृषिगत आय की धीमी विकास दर और बढ़ती विषमताएं देश में कृषि क्षेत्र से जुड़ी मौजूदा त्रासदी की प्रमुख स्रोत हैं, जो देश के लिए एक चुनौती बन गई है।
केंद्र की राजग सरकार ने इन दोनों चुनौतियों के समाधान के लिए कृषि क्षेत्र की विकास दर को बढ़ाने और किसानों के कल्‍याण को बढ़ाने के लिए दोहरी रणनीति अपनायी है। यह रणनीति उस बात से बिल्‍कुल भिन्‍न है, जब देश में केवल उत्‍पादन और उससे संबंधित लक्ष्‍यों का ही अनुसरण किया जाता था, किन्‍तु किसानों की आय के लिए कोई लक्ष्‍य अलग से निर्धारित नहीं किया जाता था। देश के योजनाबद्ध विकास के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब विकास के संदर्भ में लक्ष्‍य के रूप में निर्धारित किया गया है कि वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना किया जाए। यह बात इस दृष्टि से भी महत्‍वपूर्ण है कि देश के लगभग आधे परिवार कृषि और इससे संबंधित क्रियाक्लापों से अपनी आजीविका प्राप्‍त करते हैं। समाज के इतने बड़े हिस्‍से की आय बढ़ाना और उनकी खुशहाली की दिशा में पहल करना प्रधानमंत्री के ‘’सबका साथ सबका विकास’’ के सपने को साकार करने की दिशा में उठाया गया एक काफी महत्‍वपूर्ण कदम है।
कृषि क्षेत्र में विकास से जुडी पहल और नीतिगत सुधार इस दोहरी रणनीति में शामिल हैI विकास सम्बन्धी पहलों में मृदा स्वास्थ्य कार्ड, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई), (पीएमएफबीवाई), परंपरागत कृषि विकास योजना, कृषि के लिए अधिक संस्थागत ऋण सुविधा और दालों का बफर स्टॉक बनाना शामिल हैं।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना





इन पहलों और उपायों का लक्ष्य कृषि विकास दर बढ़ाना, क्षमता में सुधार लाना, लागत घटाना, उत्पादन में लचीलापन लाना है। इन उपायों से निश्चित तौर पर किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी, किन्तु इनसे अधिक आय नहीं बढ़ सकती। पिछले अनुभव के आधार पर यह अनुमान है कि इन उपायों से किसानों कि आय दोगुना करने में लगभग 25 वर्ष का समय लगेगा। इस प्रकार अगले 5-7 वर्षों में किसानों कि आय में महत्वपूर्ण वृद्धि के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त उपाय करने होंगे। इनमें कृषि उत्पादन, विपणन, और अन्य पहलुओं से सम्बंधित नीतिगत वातावरण में आवश्यक परिवर्तन करना शामिल हैं। कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों के बीच बढ़ती विषमताओं और किसानों तथा कृषि क्षेत्र की मौजूदा स्थिति का मुख्य कारण ऐसे सुधारों का सर्वथा अभाव होना है।
1990 के दशक के दौरान जब अपने देश ने अर्थव्यवस्था के लिए गैर कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण लाभों को महसूस किया था तब कई विशेषज्ञों ने गैर कृषि क्षेत्र में सुधारों के महत्व को समझ कर इसपर जोर दिया था। तदनुसार, कृषि विपणन और आतंरिक व्यापार को उदार बनाने के उद्देश्य से सन 2000 की शुरुआत में कुछ कदम उठाये गए थे। विभिन्न राज्यों में पुराने कृषि उत्पाद विपणन नियमन अधिनियम के स्थान पर एक मसौदा ए पी एम सी अधिनियम (2003) का प्रस्ताव किया गया था। दूध प्रसंस्करण उद्योग में निवेश आकर्षित करने के उद्देश्य से दूध और दूध उत्पाद आदेश में सुधार किया गया था। वर्ष 2002 में एक अन्य महत्ववपूर्ण सुधार के रूप में आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कृषिगत वस्तुओं की खरीद, आवाजाही और भण्डारण निषेध (लाइसेंस और परमिट) को हटा दिया गया था। वर्ष 2006 और 2007 के दौरान आवश्यक वस्तु अधिनियम में किये गए बदलावों को पूरी तरह वापस ले लिया गया था। कुछ राज्यों में जैसे-तैसे मॉडल ए पी एम सी अधिनियम को अंशतः और हल्के रूप में लागू किया गया था। देश के लगभग दो-तिहाई राज्यों ने अधिनियम में बदलाव तो किये किन्तु केवल एक-तिहाई राज्यों ने ही इसे अधिसूचित किया। यहाँ तक कि अधिसूचित प्रावधानों में कृषि का केवल छोटा हिस्सा शामिल किया गया था।

विकास की गति और किसानों की आय बढ़ाने में नीति सुधारों के महत्व को महसूस करते हुए और उपभोक्ताओं के हितों को पूरा करने के लिए केन्द्र सरकार ने सबसे पहले ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाजार के लिए इलेक्ट्रोनिक व्यापार मंच) पहल की शुरूआत की।


इसके बाद सरकार कृषि विपणन और कुछ अन्य क्षेत्रों में अनेक सुधार लेकर आई। एक केन्द्रीय क्षेत्र योजना के रूप में 14 अप्रैल 2015 को ई-नाम की शुरूआत की गयी थी। यह योजना कृषि उत्पादों की इलक्ट्रोनिक नीलामी के लिए अपेक्षित बुनियादी ढांचे और प्रणाली की स्थापना के लिए ई-नाम के अधीन लायी गयी प्रत्येक मंडी के लिए 75 लाख रूपये की वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है। यह नाम पोर्टल का उपयोग करते हुए पैन इंडिया एकीकृत कृषि बाजार का सृजन करने के लिए मौजूदा एपीएमसी मंडियों के साथ नेटवर्क स्थापित करेगा और इससे राज्य और देश के किसी भी हिस्से में रहने वाला व्यापारी ऑन-लाइन मंच का उपयोग करके कृषि जिन्सों की बोली लगानी की प्रक्रिया में भाग ले सकेगा। इससे कृषि बाजार के स्थानिक एकीकरण, उच्च प्रतिस्पर्धा नीलामी प्रक्रिया में पारदर्शिता, किसानों के लिए राष्ट्रव्यापी बाजार में पहुंच, किसानों के उत्पाद का गुणवत्ता के अनुसार मूल्य मिलना, ऑन लाइन भुगतान तथा बेहतर उत्पाद की उपलब्धता तथा उपभोक्ताओं के लिए उचित मूल्य जैसे विविध लाभ मिलेंगे। यह कृषि बाजारों को आधुनिक बनायेगा और कृषि विपणन के पूरे स्वरूप को बदल देगा।


इसके बाद नीति आयोग द्वारा तीन क्षेत्रों यानि कृषि बाजार, भूमि लीज और फार्मों तथा निजी भूमियों पर वानिकी में किसानों के अनुकूल कृषि सुधारों के लिए एक एजेंडा लाया गया। हमारे कृषि बाजार समय के अनुसार विकसित नहीं हुए हैं और उन्हें कानूनी तथा नियामक प्रतिबंध के कारण कमजोर बुनियादी ढांचा और प्रतिस्पर्धा का सामना करना पडा। कृषि बाजार में सुधारों के लिए इन प्रावधानों की जरूरत है-(1) निजी मंडियों की स्थापना (2) किसानों से सीधे ही खरीददारी (3) ठेके पर खेती (4) ई-ट्रेडिंग (5) एक बार ही लेवी लगाना (6) किसानों द्वारा उपभोक्ताओं को सीधे बिक्री करना (7) एकल कारोबारी लाइसेंस (8) फलों और सब्जियों का विशेष उपचार (9) बाजार में कर/शुल्क/लेवी का युक्तिकरण। इन सुधारों का उद्देश्य कृषि विपणन में आधुनिक पूंजी को आकर्षित करना, किसानों को अपने उत्पाद बेचने के लिए अन्य विकल्प उपलब्ध कराना, प्रतिस्पर्धा और वैल्यू चेन को बढ़ावा देना, एकीकृत आपूर्ति चेन के माध्यम से बिचौलियों की संख्या और उनका लाभ कम करना तथा बाजार परिचालनों को गति प्रदान करना है। इन सभी परिवर्तनों से किसानों को उनके उत्पाद के अधिक तथा उपभोक्ताओं को उचित मूल्य प्राप्त होंगे। कुछ राज्यों ने कुछ सुधारों को लागू किया है और जिनके उत्पादकों के साथ-साथ उपभोक्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण लाभ दिखाई देने लगे हैं। अनुभव ने यह दर्शाया है कि विभिन्न राज्यों में हरित क्रांति का विस्तार और सफलता फसलों के लाभकारी और सुनिश्चित मूल्यों के कारण हुआ। ई-नाम और बाजार सुधारों से किसान अपने उत्पाद के अधिक मूल्य प्राप्त करने में समर्थ होंगे जिससे कृषि बदलाव में जादुई प्रभाव दिखाई देगा।
सुधारों का दूसरा क्षेत्र कृषि भूमि की लीजिंग की उदारीकरण से संबंधित है।

उदारीकृत भूमि लीज बाजार से परिचालित जोतों का समेकन, परती भूमि, संस्थागत क्रेडिट तक पहुंच और कृषि कार्य करने में असमर्थ या अनिच्छुक किसानों की भूमि का उत्पादक उपयोग जैसी भारतीय कृषि की अनेक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है। पारदर्शी भूमि लीजिंग, कानून, संभावित पट्टेदार या किरायेदार, फसल हिस्सेदार को भूमि के मालिक के साथ लिखित अनुबंध करने की अनुमति देता है जो एक जोरदार सुधार है। आदर्श कानून के तहत भूमि मालिक भी पट्टेदार को बिना किसी डर के अपनी भूमि ठेके पर देने में समर्थ होगा। उदारीकृत और सुरक्षित भूमि लीज बाजार का सबसे बडा लाभ यह होगा कि इससे खेती को अनाकर्षक या अव्यवहार्य मानने वाले किसानों को कृषि कार्य से अलग करने के कार्य को सरल बनायेगा तथा उन किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत बनायेगा जो कृषि कार्य में लगे रहना चाहते हैं और परिचालित जोतों की मात्रा बढ़ाना चाहते हैं। अन्य बातों के साथ इससे भूमि जोत के परिचालन का समेकन होगा जो जोतों का आकार घटने और उसके टुकडें होने के कारण आवश्यक हो गया है।
नीति आयोग ने “माडल लैंड लीजिंग अधिनियम” तैयार किये हैं जिन्हें विविध राज्य मौजूदा भूमि लीज प्रावधानों को सुधार करने में उपयोग कर सकते हैं। मौजूदा नियमों का भूमि कार्यकाल प्रणालियों और पहाडी राज्यों की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भी उपयोग किया जा सकता है। नीति आयोग राज्यों को अपने भूमि लीजिंग कानूनों को तैयार करने और भूमि लीजिंग के लाभों के बारे में विभिन्न हितधारकों में जागरूकता पैदा करने में मदद कर रहा है।
सुधार के लिए चुना गया तीसरा क्षेत्र निजी भूमि पर वानिकी या वृक्षारोपण से संबंधित है। निजी भूमि पर वानिकी, पेडों के गिरने या पेड उत्पादों के विपणन के लिए मार्गस्थ अनुमति पर प्रतिबिंदों द्वारा विनियंत्रित है। इन विनियमों ने निजी भूमियों पर पेड उगाने पर अधिक प्रतिबंध और निरुत्साह को बढ़ावा दिया है। इन विनियमों में छूट देने तथा निजी भूमियों पर पेड उगाने में मदद करने के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भारत सरकार ने राज्यों को एडवाइजरी परिपत्रित की है। भारत अपनी लकड़ी की मांग का अधिकांश हिस्सा निर्यात से पूरा करता है और देश में वृक्ष उत्पादों की बिक्री से किसानों की आय बढ़ाने की बहुत अधिक संभावना है। इन सुधारों में इमारती लकड़ी की आपूर्ति बढ़ाने के लिए इमारती लकड़ी और अन्य लकड़ी पर आधारित उद्योग की स्थापना का भी प्रस्ताव करते हैं।
केन्द्र सरकार ई-नाम, के लिए वित्तीय प्रोत्साहन उपलब्ध करा रही हैं, कृषि क्षेत्र में सुधारों के लिए एजेंडे का प्रस्ताव कर रही है और राज्यों को विभिन्न सुधार लागू करने के लिए मना रही है लेकिन इनका कार्यान्वयन राज्यों पर निर्भर करता है ये सुधार कृषि क्षेत्र में संभावनाओं का विस्तार करने किसानों की आय में महत्वपूर्ण बढ़ोत्तरी करने और कृषि की कायाकल्प करने में बड़ी भूमिका निभायेंगे।

*लेखक रमेश चंद नीति आयोग के सदस्य हैं। इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं।


Part-time Worker to Fashion Designer


This is a story that might find resonance across the length and breadth of India. Kiran Rayakvar is today, a self-made woman, thanks to her passion and the support provided by the Stand-Up India Scheme. Kiran’s family was not earning enough to make both ends meet. As she was educated and qualified, she was supplementing the family income by teaching young children in the neighborhood. But, deep in her heart, there was a dream to do something of her own.

Kiran was an M.A/M.S.W and diploma holder in fashion designing. Her wish was to open her boutique, but the lack of resources and support never allowed her to realise this dream.


Stand-Up India not only made her 20-year-old dream come true, but has brought a happy and remarkable change in the life of twenty other aspiring females. Kiran heard of the Stand-Up India Scheme from TV. She initiated and took her first move by sending an online application to the nearby bank for a loan under the Scheme. She was pleasantly surprised to get it within ten days.

Kiran is today, running a complete garment unit at Rajpura, Burhanpur, situated at a distance of half a km from her home. She and her team are working on school uniforms and costume designs. She has a team of 20 women who are working for her. She thinks of them as her extended family.

Today, Kiran’s husband has left his job and supporting her team in this flourishing garment business. Wearing a shy smile, Kiran says that Stand-Up India not only changed her life but has brought happiness to 20 more families.



Crop Insurance Leads to Dignity


A 45 – year old illiterate widow, Mahadevi Basappa Dyamangoudar, having only two acres of dry land in Katkol village of Ramdurg Block in Belagavi District, was yet another victim of the scanty monsoon during Kharif-2016 and the consequent 60% decline in yield of maize.

Belagavi, in Karnataka, is predominantly an agrarian district where 50% of the region has to be irrigated while the rest depends on rainfall. The vagaries of monsoon and the resultant drying of tube wells had been too cruel on her family containing two elders and six female siblings. To add to it, destiny was quite cruel as the sole bread earning member of the family was trampled to death by a buffalo that was reared at home as a part of subsistence.

When the dry spell continued through Rabi – 2016 as well, she thankfully looks back at the time when the District Administration had convinced her family to be a part of PMFBY during Kharif-2016.


The PMFBY ensured a claim of INR 7,346/-, eight times the premium amount of INR 939/- paid by her husband. “This is what had helped our family to survive the drought, and the compensation I received has enabled me to face the harsh reality of life with dignity and self-esteem,” she says with tears in her eyes.

She looks lovingly at her fields and hopes the rain gods would smile on Belagavi. “But sometimes I think God has a way of working things out.


The PMFBY is a godsend Scheme and has brought a ray of hope in our lives. I believe it is one of the best possible ways of minimising the hardship to the farming community arising out of crop failure,” she adds



Technology providing Healthcare


Bengaluru is known as the ‘Silicon Valley’ of India. The first lot of software companies started from here and became world renowned names in the next two decades. Over the years, Startup became a buzzword in Bengaluru and Karnataka. Young people, full of ideas, were ready to change the world for the better-using technology and their intellect.

One of the startups incubated at the Government of Karnataka – IAMAI (Internet and Mobile Association of India) supported Mobile 10X Accelerator is ‘Chikitsak’.

Chikitsak’ was started by a five-member team, which wanted to bring about a change in the healthcare industry.


Everyone knows that timely checkups and early detection are half the battle won in the case of deadly diseases. High prices, time pressure and cost, are some of the reasons that people don’t get their checkups done. Chikitsak takes care of all the above.

For the moderate sum of INR 50/-, Chikitsak uses a portable Bluetooth enabled kit to screen for vitals – Blood Pressure, Blood Sugar, ECG, Oxygen Saturation, Temperature, Weight, BMI, Heart rate, Pulmonary Function and vision. And, for an additional INR 50/-, connect to a doctor for consultation. The seamless transfer of data via Bluetooth to an Android tab, ensures freedom from data errors and allows for analytics. Since, the data is on the cloud, the same can be retrieved anytime, anywhere in the future.

The bunch of founders are engineers and are bringing their deep technology knowledge to an area which can help people. They have already tied up with more than 300 NGO’s across Karnataka, and an average of 1.2 lakh tests are being done every month. They have also focused on supporting women entrepreneurs, Chikitsaks, who are trained to be the field force for the startup.

Post training, they are sent back to work out of their village and locality. It has been observed that each Chikitsak can earn around INR12,500/- per month by providing the screening services.

‘Chikitsak’ has already raised INR 70 Lakh in two small rounds and have a monthly revenue run rate of INR 14 Lakh. This clearly shows that the service has taken off and they are on the right track.

In the words of the founders, “Government of Karnataka has been very helpful in allowing us to meet the right people at the right places and has been an immense value add for the certifications and essential business documentations. We couldn’t have reached where we are today without their invaluable support.”



The villages are flooded, this time with light


Rajibul Haq had no way of contacting his family when he was away at work in different cities. Though, he could afford a mobile phone for his family back in Katihar, there was no electricity to charge it. Mohammed Miraj’s family suffered due to floods every year and did not know how to recoup the losses. They were not in a position to start any business either. Mohammed Atif ’s family was living in primitive conditions. The menfolk would go to other States in search of work. Till they returned with some money, it was an interminable wait for the women of the family, each passing day filled with fear and unease, especially, after sunset during the floods.

All three BPL families belonged to Katihar District, in the plains of North Eastern Bihar. With four major rivers flowing through the district, seven of its 16 blocks are affected severely by flood and are neglected in terms of electricity supply.

Under DDUGJY, it was decided to provide electricity to 970 un-electried villages under 238 Gram Panchayats of the district. The learning from the shoddy implementation of earlier projects was taken into consideration, while planning the roll-out and the results were a huge success. There was great enthusiasm and support for the electrification among the villagers.

In the Flooded areas of Ahmadabad block, the villagers helped transport transformers, poles, conductors and other equipment, by actually carrying them on their shoulders. Work was never stopped even in the face of natural calamities. Till date, more than 556 villages out of the 970 un-electrified villages have been provided power and the villagers are delighted.


Says Mohammed Atif, “We are grateful to the authorities for providing us something that we did not have even after 70 years of independence. It is unbelievable that we actually have light in our homes.”

Mohammed Miraj’s son is dreaming big. He wants to start a mobile shop to download songs into mobiles. And Rajibul Haq can now keep in touch with his family through a mobile phone, though the signals are still quite poor. Life has surely changed for the better with electricity. These villages are now buzzing with a renewed lease of life with TV, mobile shops and other small businesses all set to flourish.



His Polyhouse is the talk of the Village


M. Murali of Kolamasanapalli village in Chittoor District quit his small trading business and began “protected farming”. Today he is the proud owner of a polyhouse – a type of a greenhouse where a tunnel is built with polyethylene in a semicircular shape. Polyethylene sheets stabilize the ultraviolet rays and help in proper photosynthesis.

The crops are also protected from high humidity or high temperature as well as from birds and insects. “I came across a leaflet about the PMKSY programme on protected cultivation of high-value vegetables like European cucumber; so I met the officials and set up a polyhouse in an area of 2,000 sq mts (0.2 acres) with drip irrigation,” he recalls.

In a normal farm, nearly a third of the crops may be lost to pests but in polyhouse farming, the yield is about 3-5 times more, without much damage or loss. “We can farm any crop in a polyhouse regardless of season or place,” he adds.

Moreover, there is a 50% water saving thanks to micro irrigation. Murali reaped a net profit of INR 3.60 lakh from the European cucumber crop grown in his polyhouse – equal to that earned by open cultivation of vegetables in 5 acres.

Enthused by his success, fellow farmers in the village have come forward to take up protected cultivation in an area of 25 acres. PMKSY is like a godsend for the farmers of Kolamasanapalli.



Selling Tomatoes through the Computer


Mundre Changal Rayudu is a small farmer having three acres of land right in the centre of a drought-prone village Gurramkonda in Chittoor district. A remote village, located on a hilly terrain with shallow soils, it is perennially drought-hit since it lies in the rain shadow region and is cursed with very deep ground water level. He cultivates tomatoes in two acres of land which yield 80-100 tonnes every year. Almost every year he struggles to produce a good harvest and nearly every year the village is hit by drought. But sheer survival instincts help him overcome his farming troubles.

For him, the biggest relief came through the creation of the e-NAM – a unified national market for agricultural commodities.


Earlier, he was used to carting his produce to faraway villages for getting a better price, haggling with merciless commission agents and returning home with less-than-expected prices. After the e-NAM online trading came into full play, he couldn’t believe that he could actually command a much higher price through online trading than the traditional outcry method. “My income has increased by 30-40% per MT from last year. It is sometimes dificult to believe that I can do this just by sitting in front of a computer,” he says in sheer amazement.

Today all the farmers in Chittoor can get competitive prices in a transparent manner through online bidding. Buyers cannot form cartels and reduce rates. Neither can they make any unauthorised deductions like excess commission, deduction of grading charges, collection of loading charges, etc. “When e-NAM was introduced in Gurramkonda Tomato Yard in November 2016, we were invited to meetings where we were educated on the different malpractices done by traders/commission agents during purchases like under-weighment, erroneous grading, delayed payments, exorbitant commission rates, jackpot, etc., and how the farmers were cheated by transporters often leading to forced selling at throwaway prices,” he added. “Now, it is all a thing of the past“, says a relieved Rayudu.



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