यह देश की स्वच्छ ऊर्जा की तत्काल और भविष्य में होने वाली मांग की आपूर्ति करेगा 

i201762301डॉ. श्रीकुमार बनर्जी    

                        700 मेगावाट्स क्षमता के 10 दबावयुक्त भारी जल रिएक्टर (पीएचडव्ल्यूआर) के निर्माण की सरकार की घोषणा स्वदेशी पीएचडब्ल्यूआर तकनीक में विकास को बढ़ावा देगी, जिसक निर्माण विगत चार दशकों के दौरान किया गया है।  मौजूदा छह स्वदेशी पीएचडब्ल्यूआर की कार्यक्षमता विगत पांच सालों में औसतन 80 फीसद तक रही है।

राजस्थान परमाणु रिएक्टर आरएपीएस-5 ने बाद की बढ़ी हुई अवधि में सबसे लम्बे समय 765 दिनों तक अबाधित ऊर्जा आपूर्ति की हैजो वर्ल्ड रिकार्ड में दूसरा मामला है।यह औसत बिजली दरों की तुलना में जलविद्युत ऊर्जा के बाद काफी सस्ती है। सबसे बढ़कर तो यह वास्तविकता है कि इसके सौ फीसद कल-पुज्रे अपने देश में ही बनाये जाते हैं।          

डॉएम.आरश्रीनिवासन ने ‘ हिन्दू’ में लिखे अपने हालिया आलेख (19 मई 2017 को प्रकाशितमें पीएचडब्ल्यूआर केसफलतापूर्वक निर्माण के इतिहास और परमाणु ऊर्जा क्षमता के निर्माण की कम अवधि की कार्यनीति पर बेहतर तरीकेसे प्रकाश डाला है। पीएचडब्ल्यूआर के उद्भव और उसके उत्क्रमित सुरक्षा इंतजामों के बारे में अमेरिकन सोसाइटी ऑफमैकेनिकल इंजीनियर्स की तरफ प्रकाशित जर्नल के अप्रैल 2017 के ‘न्यूक्लियर इंजीनियरिंग एंड रेडियन साइंस’ पर केंद्रित विशेष अंक में धारावाहिक प्रकाशित किया गया है।

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      भारत में पीएचडब्ल्यूआर प्रौद्योगिकी की शुरुआत 1960 के उत्तरार्ध में राजस्थान अटॉमिक पॉवर स्टेशन (आरएपीएस-1) हुई थी। इसकीआधारशिला संयुक्त भारत- कनाडा न्यूक्लियर साझेदारी के तहत रखी गई थी और इसकी डिजाइन (रूपरेखाभी कनाडा में स्थापित डगलस प्वाइंटरिएक्टर जैसी बनाई गई थी। ऐसी पहली इकाई के लिए कनाडा ने संयंत्र के सभी प्रमुख उपकरण मुहैया कराये थेजबकि निर्माणस्थापना औरकार्य पण्रालियों के सुचारु करने की जिम्मेदारी भारत की थी।

दूसरी इकाई (आरएपीएस-2) की स्थापना में आयातित उपकरणों की मात्रा उल्लेखनीय रूपसे कम हो गई और उपकरणों के बड़े कलपुजरे में भारतीय भागीदारी जोर पकड़ती गई। पोखरण में 1974 में किये गए पहले परमाणु परीक्षण के बादतो कनाडा ने पूरी तरह से हाथ खींच लिया और भारतीय इंजीनियरों ने अपने बूते ही निर्माण का काम पूरा किया और स्वदेशी उपकरणों से बने को इनसंयंत्रों को चालू किया। पीएचडब्ल्यूआर की तीसरी इकाई (मद्रास एटमिक पॉवर स्टेशनएमएपीएस-1) के बाद से तो डिजाइन का विकास और इसकाभारतीयकरण इस क्षेत्र में दुनिया भर में हो रहे बदलावों  सुरक्षा के उनके नये मानकों के अनुरूप किया जाने लगा। इकाई की स्थापना में लगने वालेसमय  लागत में कटौती जैसे सुधार किये गए और बेहतर क्षमता के सृजन के लिए कार्यसंचालन की विसनीयता बढ़ाई गई। स्वदेशी मानकों परविकसित पीएचडब्ल्यूआर की 220 मेगावाट्स की पहली दो इकाइयां नरोरा अटॉमिक पॉवर स्टेशन (एनएपीएसमें स्थापित की गई थीं। इस मानकीकृतऔर अनुकूल डिजाइन में कई नई सुरक्षा पद्धतियां शामिल थींजिन्हें 2 गुना 220 मेगावाट्स की क्षमता की सात पांच और युगल- इकाइयों में शामिलकिया गया थाजो काकरापरकैगा और रावटभाटा में स्थापित हुई थीं। आर्थिक मापमान को देखते हुए पीएचडब्ल्यूआर की 540 मेगावाट्स की डिजाइनका विकास किया गया और ऐसी दो इकाइयां तारापुर में स्थापित की गई। इसके आगेअतिरिक्त ऊर्जा बचत का उपयोग करते और लागत सुधारते हुएऔर एनपीसीआईएल ने 540 मेगावाट्स के पीएचडब्ल्यूआर की डिजाइन में बिना किसी भारी बदलाव के उसे 700 मेगावाट्स का किया गया। इस डिजाइन की चार इकाइयां फिलहाल रावतभाटा और कर्करापार में स्थापित की जा रही हैं।

जहां तक निरापद सुरक्षा की चिंता का वाजिब सवाल है तो पीएचडब्ल्यूआर प्रौद्योगिकी अपने में निहित कई सारे सुरक्षा वैशिष्ट्यों के चलते बिल्कुल उपयुक्त है।  पीएचडब्ल्यूआर डिजाइन की सबसे बड़ी खासियत इसमें मोटी भीत्ति वाले प्रेशर ट्यूब का इस्तेमाल किया जाना हैजबकि बड़े दाबवाले रिएक्टर्स में बड़े पात्र का उपयोग किया जाता है। यह दाब के घेराव को बड़ी संख्या में छोटे डायमीटर के प्रेशर ट्यूब में कर देता है।

  परिणामस्वरूपऐसी डिजाइन में दाब के घेराव का दुर्घटनावश तोड़फोड़ प्रेशर वेजल टाइप रिएक्टर की तुलना में बहुत कम नुकसानदायक होगा। पीएचडब्ल्यूआर कामुख्य हिस्सा सिलिंडरा यानी बड़े सिलिंडर के आकार के पात्र और उसके मेहराब में चारों तरफ बड़ी मात्रा में कम तापमान और कम दाब के पानी काघिराव होता है।

  संयंत्र को ठंडा रखने का यह अन्वेषित उपाय किसी आकस्मिकता की प्रक्रिया को विलंबित कर देता है और इस प्रकारऑपरेर्ट्स कोहस्तक्षेप करने तथा सुरक्षा के इंतजाम करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है।

 ये अंतरर्निहित ताप संचालक (ताप के संचालन और प्रसारण के लिएबनाया गया धातु का संचालक यानी कंडक्टरकी केवल तभी जरूरत पड़ती हैजब अनेक गंभीर दुर्घटना वाले परिदृश्यों में वाष्प उत्पादक के जरियेप्रारम्भिक ताप संचालनया शीत पण्राली बंद होकर अनुपलब्ध हो जाती है।

इसके अलावा,700 मेगावाट्स पीएसडब्ल्यूआर डिजाइन ने मुस्तैद पैसिव डिके हीट रिमूवल सिस्टम के जरिये सुरक्षा बढ़ा दी हैजिसकी क्षमताबिना किसी ऑपरेटर्स की सहायता के नष्ट ताप को हटाने की है।     इसी तरह की प्रौद्योगिकी फुकुशिमा के जैसे हादसे रोकने के लिए तीसरी और इसकेआगे की पीढ़ी के संयंत्रों में अपनाई गई है। 700 मेगावाट्स की भारतीय पीएचडब्ल्यूआर डिजाइन में रिएक्टर से रिसाव को रोकने के लिए स्टील लाइन्डनियंत्रक बनाये गए हैं। और शीतलक के नुकसान होने की स्थिति में होने वाली दुर्घटना और डिजाइन की हद से ज्यादा होने वाले रेडियोधर्मी न्यूक्लाइडको रगड़ कर साफ कर दाब को घटाने के लिए नियंतण्रछिड़काव पण्राली काम में लाई जाती है। 1960 के दशक में पहले चरण के भारतीय परमाणु ऊर्जाकार्यक्रम में पीएचडब्ल्यूआर का चयन करने के मुख्य कारण प्राकृतिक यूरेनियम ऑक्साइड का ईधन के रूप में इस्तेमालऊर्जा उत्पादन में खनिजयूरेनियम का बेहतर उपयोग और पूरी तरह आत्मनिर्भर प्रौद्योगिकी की स्थापना की संभावना तलाशना रहे हैं। भाभा परमाणु अनुंसधान केंद्र में चारदशकों के अथक अनुसंधानडिजाइन  विकास कार्यक्रमों के बाद और परमाणु ऊर्जा सहयोग तथा उनके उद्यम में समान सहयोगी कुछ साझेदारों नेविर्निर्माण और संरचनागत कामों को करने का बीड़ा उठायाजिसने भारत को प्रौद्योगिकी की स्थापना में पूर्ण रूप से सक्षमसमर्थ बनाया। खनिजपदाथरेखननप्रसंस्करण और ईधन का निर्माण  संरचनागत पदार्थउपयोग किये गए परमाणु ईधन का पुनर्ससाधन और रेडियोसक्रिय पदाथरे कास्थिरीकरण यानी समूचे ईधनचक्र में अर्जित निपुणता ने भारत को परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में एक खास मुकाम दे दिया है। देश में यूरेनियम के सीमितभंडार की बाध्यता के चलते पहले दौर में परमाणु ऊर्जा में त्वरित संवृद्धि बाधित होती रही थीअब देश में ही संवर्धित यूरेनियम के उत्पादन होने औरकई देशों के साथ असैनिक परमाणु सहयोग संधि के अंतर्गत निर्यातित यूरेनियम की आपूर्ति से वह वृद्धि सुगम हो गई?है। विगत वित्तीय वर्ष के दौरानन्यूक्लीयर फ्यूल कॉम्पलेक्स ने 1500 टन से भी ज्यादा परमाणु ईधन का रिकार्ड उत्पादन किया था और अटॉमिक मिनरल डिविजन फॉर एक्सपलोरेशनने नये यूरेनियम का भंडार पाया था। खोज और अनुसंधान ने भारत में यूरेनियम का कुल भंडारण 200000 टन तक पहुंचा दिया है।

अब भारत परमाणु ऊर्जा क्षमता के क्षेत्र में त्वरित संवृद्धि हासिल करने के लिए पूरी तरह से तैयार है, जो स्वच्छ ऊर्जा की मांग की पूर्ति के लिएआवश्यक है। देश में प्रति व्यक्ति बिजली उपभोग की सीमा (अब 1000 किलोवाट्स) औसत वि का दो तिहाई है। स्पष्ट है कि हमारे लोगों के जीवन स्तरको और बेहतर करने के लिए?वैकल्पिक गैर कार्बन बिजली उत्पादन को बढ़ावा देने की जरूरत है। सौर ऊर्जा और वायु ऊर्जा के क्षेत्र में प्रभावकारीसंवृद्धि ने अन्य क्षेत्रों में उपलब्ध बिजली के उपयोग पर दर्शनीय प्रभाव डाला है। हालांकि इस पर जोर देने की आवश्यकता है कि सौर और वायु जैसेवितरित और अनिरंतर ऊर्जा के स्रेत बेस लोड की मांग की सक्षमता से आपूर्ति नहीं कर सकते। परमाणु ऊर्जा का स्रेत संकेंद्रित, लगातार और विसनीयहै। इसलिए यह सौर और वायु ऊर्जा की समपूरकता के साथ व्यावहारिक तौर पर कॉर्बन का कोई निशान छोड़े, बिजली की समस्त मांगों की पूर्ति करसकता है। अब जबकि बड़े शहरों से बिजली की भारी मांग आ रही है और औद्योगिक परिसर अबाधित और संकेंद्रित ऊर्जा के प्रकार की मांग करते हैं।बिल्कुल इसी तरह वितरित ऊर्जा की भारी मांग हमारे ग्रामीण क्षेत्रों की भी है। इसलिए ऊर्जा के योजनाकार इन तरह-तरह की ऊर्जा आवश्यकताओं कोआपस में मिलाकर एक अपेक्षित समाधान पाने का प्रयास कर रहे हैं।

दूसरा मसला, जिस पर हमें विचार करने की आवश्यकता है कि किस तरह हम तेजी के साथ परमाणु ऊर्जा क्षमता को हासिल कर सकते हैं। इससंदर्भ में कोई भी नौंवें दशक के फ्रांस व अमेरिका के अनुभवों और हाल के वर्षो में चीन को मिले तजुबरे का लाभ उठा सकता है। इन सभी देशों नेकुछ मानकीकृत डिजाइन वाले पथरक्षा या सिलसिलेवार तरीके से की गई परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना के जरिये बड़ा ही प्रभावकारी विकास हासिलकिया है। ऐसी कार्यनीति में, उद्योग अत्याधुनिक परमाणु पुजरे के प्रतिबद्ध उत्पादन में सक्षम हो सकते हैं और निर्माण कम्पनियां अपनी मानव शक्तिऔर उसके कौशल को प्रभावी तरीके से नियोजित कर सकती हैं। 700 मेगावाट के 10 पीएचडब्ल्यूआर को निकट भविष्य में स्थापित करने का फैसलाउद्योग क्षेत्र को परमाणु ऊर्जा के सिलसिलेवार पुजरे के उत्पादन की चुनौतियों को मंजूर करने के लिए उत्साह से लबरेज कर देगा। परमाणु ऊर्जाउत्पादन की गतिविधियों में फैलाव न केवल आपूर्ति क्षेत्र को व्यापक करेगा बल्कि इसमें सहभागी उद्योगों को भी गुणवत्ता के प्रति जागरूक करेगा। इसतरह वे परमाणु पुजों के निर्यातक भी बन सकते हैं। परमाणु संयंत्र के निर्माण-पूर्व अवधि में कटौती का बिजली की दरों पर जबर्दस्त प्रभाव पड़ेगा।

 जैसा कि डॉ श्रीनिवासन द्वारा उल्लेख किया जाता रहा है कि भारत 900 मेगावाट्स के दाबानुकूलित जल रिएक्ट (पीडब्ल्यूआर) की खुद सेडिजाइन करने की दहलीज पर है। बड़े आकार का दाबानुकूल पात्र बनाने की क्षमता अब अपने देश में ही उपलब्ध है और हमारा खुद का समस्थानिकसंवर्धन संयंत्र संवर्धित यूरेनियम ईधन की मांग के एक भाग को एक दशक के भीतर ही आपूर्ति करने में सक्षम हो जाएगा। यह रूस, फ्रांस औरअमेरिका से निर्यातित होने वाले पीडब्ल्यूआर के अतिरिक्त होगा, जिसका लक्ष्य देश में परमाणु ऊर्जा के विकास को विस्तार देना है। कुंडकुलम में दोऔर 1000 मेगावाट्स के पीडब्ल्यूआर (यूनिट-5 और यूनिट-6 ) के लिए भारत और रूस के बीच हालिया हुआ करार इस योजना की पुष्टि करता है।संचालन में सहुलियत और औसत उच्च क्षमता के कारक ने पीडब्ल्यूआर को परमाणु ऊर्जा तापघरों के बाद दुनिया में सबसे लोकप्रिय बना दिया है किसभी तरह के पॉवर रिएक्टरों का 85 फीसद पीडब्ल्यूआर की तरह के हैं। भारत में पीडब्ल्यूआर और पीएचडब्ल्यूआर को मिला कर संचालित करने केविशेष फायदे होंगे; क्योंकि पहले वाले संयंत्र में इस्तेमाल किये गए ईधन, जो यूरेनियम-235 का एक प्रतिशत से अधिक हिस्सा उपभोग करता है, उसको पुनर्ससाधित किया जा सकता है और उसका पीएचडब्ल्यूआर में ईधन के रूप में क्रमबद्धता में उपयोग किया जा सकता है।  यह विकासमान ऊर्जाचक्र आखिरकार पहले चरण की ऊर्जा पीढ़ी से तीसरे चरण के जगजाहिर कार्यक्रम तक चलता चला आया है।

भारत ने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के प्रारंभ में जिस संवृत्त ईधन चक्र की योग्यता को अंगीकार किया, उसने न केवल ईधन संसाधन को बहुआयामीकिया बल्कि देश में परमाणु कचरे के रूप में रेडियो-सक्रिय बोझ को नाटकीय तरीके से घटा दिया। इस प्रसंग में परमाणु कचरे से छोटे अक्टेनिड कोअलग करने के सफल विकास, इसको पायलट प्लांट में इस्तेमाल करने के भारत के प्रयासों ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। पीएचडब्ल्यूआरके संचालन में व्यवहृत ईधन को पुनर्ससाधित करने में मिले प्लूटोनिम को यूरेनियम से मिलाकर प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर)?के कोरके लिए ऑक्साइड ईधन तैयार किया जाता रहा है, जिसने संयंत्र का संचालन प्रारम्भ करने के पहले उसकी तैयारी की गतिविधियों की शुरुआती पहलकी है। भारत के दूसरे चरण के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में प्रवेश के साथ, जिसमें फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स न केवल स्थापित परमाणु संयंत्रों की क्षमताबढ़ाएंगे बल्कि आणविक पदाथरे को उत्पन्न करेंगे, उर्वर समस्थानिक के जरिये प्लूटोनिम-239 और यूरेनियम-233 को और क्रमश: यूरेनियम-238 औरथोरियम-232 को उत्पन्न करेंगे। विस्तरित कार्य क्षेत्र और पहले चरण के कार्यक्रम का द्रुत क्रियान्वयन देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लक्ष्यों परदूरगामी प्रभाव डालेंगे।  यूरेनियम-प्लूटोनिम ईधन चक्र में बहुआयामी पुनर्चकण्रने विखंडनीय सामग्री की आपूर्ति क्षमता में फैक्टर 60 के जरिये औरबढ़ोतरी का अनुमान है। थोरियम के बड़े भंडारण, जो मौजूदा आकलन के मुताबिक यूरेनियम से चार गुना ज्यादा है, के उपयोग से तो भारत स्वच्छपरमाणु ऊर्जा की आपूर्ति कई सदियों तक कर सकता है।

     (लेखक डॉ श्रीकुमार बनर्जी एइसी के पूर्व चेयरमैन और डीएई के पूर्व सेक्रेटरी हैं। वर्तमान               में वह डीएई में होमी भाभा चेयर प्रोफेसर हैं।)

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