i201751503वी.मोहन राव*

      ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतर विकास और कल्‍याण गतिविधियों के लिए नोडल मंत्रालय होने के नाते ग्रामीण विकास मंत्रालय देश की समग्र विकास नीति में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है। मंत्रालय का विजन और मिशन बहुपक्षीय रणनीति के माध्‍यम से ग्रामीण भारत का सतत और समावेशी विकास है। गरीबी दूर करने की बहुपक्षीय रणनीतियों में आजीविका अवसर बढ़ाना, सामाजिक सुरक्षा कवच प्रदान करना और विकास के लिए अवसंरचना विकसित करना है। आशा है कि इससे ग्रामीण भारत में जीवन में गुणवत्‍ता आएगी, विकास असंतुलन सही होगा और इस प्रक्रिया में समाज के वंचित वर्गों तक पहुंचा जा सकेगा।

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      ग्रामीण विकास का अर्थ लोगों को आर्थिक लाभ के साथ-साथ उनका सामाजिक बदलाव भी है। ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी, नियोजन विकेन्‍द्रीकरण, भूमि सुधारों को बेहतर ढंग से लागू करने से ग्रामीण लोगों का भविष्‍य उज्‍जवल होगा।

      प्रारंभ में विकास के लिए मुख्‍य जोर कृषि उद्योग, संचार, शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य तथा संबंधित क्षेत्रों पर दिया गया। बाद में यह महसूस करते हुए कि तेजी से विकास तभी हो सकता है, यदि सरकारी प्रयासों के पूरक रूप में निचले स्‍तर पर प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष रूप में लोगों की भागीदारी हो।

      इस वर्ष के बजट में यह प्रयास दिखता है। केन्‍द्रीय वित्‍त मंत्री अरूण जेटली ने 2017-18 के लिए ग्रामीण, कृषि तथा संबद्ध क्षेत्रों के लिए कुल 1,87,223 करोड़ रूपये का रिकॉर्ड आबंटन किया है। यह पिछले वर्ष के आबंटन से 24 प्रतिशत अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार सूखे की स्थिति को देखते हुए यह वृद्धि आवश्‍यक हो गई थी। नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्‍व वाली सरकार लोगों के समग्र विकास के लिए नये कार्यक्रम और नीतियां लागू करने पर जोर दे रही है और ग्रामीण विकास समाज परिवर्तन का एक महत्‍वपूर्ण क्षेत्र है।

      महात्‍मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एमजीएनआरईजीए) ऐसा ही कार्यक्रम है। इसका उद्देश्‍य देश के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए आजीविका सुरक्षा बढ़ाना है। यह काम उन परिवारों के वयस्‍क सदस्‍यों को वित्‍त वर्ष में सौ दिन का पारिश्रमिक रोजगार गारंटी प्रदान कराना है, जो अकुशल मानव कार्य करने के इच्‍छुक हैं। वित्‍त वर्ष 2016 में एमजीएनआरईजीएस के संचालन में अप्रत्‍याशित परिवर्तन देखने को मिला। इसमें सतत रूप से जल संरक्षण पर बल दिया गया। एनआरईजीए सॉफ्ट में आधार से जुड़े 82 प्रतिशत से अधिक सक्रिय श्रमिक (9.1 करोड़) आधार आधारित पेमेंट ब्रिज में 4.6 करोड़ श्रमिक, बैंक/डाकघर खातों के जरिये 96 प्रतिशत पारिश्रमिक का इलेक्‍ट्रॉनिक भुगतान, 89 लाख से अधिक परिस‍ंपत्तियों का जियो जुड़ाव, उचित जांच के बाद 93 लाख जॉब कार्ड की समाप्ति, कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सूखे से मुकाबले के लिए व्‍यापक जल संरक्षण के माध्‍यम से एमजीएनआरईजीए ने सुसंचालित कार्यक्रम के रूप में स्‍वयं को स्‍थापित किया है और मांग आधार पर रोजगार प्रदान करते हुए गरीब क्षेत्र में आजीविका सुरक्षा प्रदान करने के लिए टिकाऊ परिसंपत्तियों का सृजन कर रहा है।

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      पहली बार श्रम बजट को स्‍वीकृत करते समय राज्‍यों के वंचित स्‍तरों पर ध्‍यान दिया गया। वित्‍त वर्ष 2016-17 की अप्रैल से जुलाई अवधि में निरंतर सूखे के कारण काम की अप्रत्‍याशित मांग देखी गई। इसके बाद 75 प्रतिशत जिलों में अच्‍छे मानसून के कारण कर्नाटक जैसे सूखा प्रभावित क्षेत्रों में मांग केन्द्रित रही। दिसम्‍बर के आगे, जैसा कि प्रत्‍येक वर्ष होता है, फिर काम की मांग बढ़ी। एमजीएनआरईजीएस ने 230 करोड़ मानव दिवस हासिल किया। यह संशोधित श्रम  बजट से अधिक है।banner4

एमजीआरईजीएस में किसी भी वर्ष में 58,056 करोड़ रूपये का कुल अस्‍थायी व्‍यय (केन्‍द्र और राज्‍य) सबसे अधिक है। रोजगार सृजन से ग्रामीण सम्‍पर्क की ओर बढ़ते हुए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के अंतर्गत 2016-17 में रिकॉर्ड 47,350 किलोमीटर ग्रामीण सड़कें बनाई गई। यह पिछले सात वर्षों में से किसी एक वर्ष में सबसे अधिक सड़क निर्माण है। 2011-14 के दौरान पीएमजीएसवाई सड़कों को बनाने की औसत दर रोजाना 73 किलोमीटर थी, जो 2014-15 और 2015-16 में बढ़कर प्रतिदिन 100 किलोमीटर हो गई। 2016-17 में प्रतिदिन रिकॉर्ड 130 किलोमीटर सड़क बनाने का लक्ष्‍य प्राप्‍त कर लिया गया है। यह पिछले सात वर्षों में औसत वार्षिक निर्माण दर का सर्वाधिक है।pgsy-b-24-7-2011

 ग्रामीण सड़कों के ‘कार्बन पदचिन्‍ह’ और प्रदूषण को कम करने, कार्यशीलता बढ़ाने और लागत को कम करने की दृष्टि से पीएमजीएसवाई द्वारा ग्रामीण सड़कों के निर्माण में पूरे जोर-शोर से ‘हरित प्रौद्योगिकियों’ के इस्‍तेमाल तथा गैर-पारम्‍परिक सामग्रियों जैसे – फालतू प्‍लास्टिक, कोल्‍ड मिक्‍स, जियो टैक्‍सटाइल, फ्लाई ऐश, लौह और तांबे के इस्‍तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है। वर्ष 2016-।7 में हरित प्रौद्योगिकियों के इस्‍तेमाल से 4,113.13 किलोमीटर पीएमजीएसवाई सड़कों का निर्माण किया गया। वर्ष 2000-2014 के दौरान 806.93 किलोमीटर और 2014-।6 के दौरान 2,634.02 किलोमीटर की तुलना में यह बहुत अधिक है।

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   ग्रामीण गरीबों के लिए छत की समस्‍या दूर करने के संबंध में प्रधानमंत्री ने 20 नवम्‍बर, 2016 को प्रधानमंत्री आवास योजना- ग्रामीण की शुरूआत की। इस नये ग्रामीण आवासीय कार्यक्रम को सभी घरों की आवश्‍यकताओं और आकांक्षाओं को ध्‍यान में रखकर तैयार किया गया है। उच्‍च इकाई लागत के मद्देनजर इसके तहत स्‍थानीय सामग्री के इस्‍तेमाल से निर्माण कार्य किया जा रहा है और स्‍थानीय घरों का डिजाइन तैयार किया जा रहा है। इन घरों में खाना पकाने, शौचालय, रसाई गैस कनेक्‍शन, बिजली कनेक्‍शन और जलापूर्ति की व्‍यवस्‍था है। लाभार्थी अपनी आवश्‍यकतानुसार घरों की योजना बना सकते हैं। बेहतर निर्माण के लिए महत्‍वपूर्ण कौशल आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए ग्रामीण राजगीरों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। कड़ी प्रक्रिया के तहत लाभार्थियों का चयन किया जाता है,जिसके लिए सामाजिक-आर्थिक जनगणना आंकड़ों (एसईसीसी) का इस्‍तेमाल होता है। इसके तहत आवासहीन या कच्‍ची छत वाले शून्‍य, 1, 2 कच्‍चे कमरे को मानदंड बनाया गया है।pmay-gramin

एसईसीसी आंकड़ों को ग्राम सभा प्रमाणित करती है और उसके लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का भी इस्‍तेमाल किया जाता है,ताकि किसी प्रकार की त्रुटि न रहे। 2014 सीएजी की लेखा रिपोर्ट में इस समस्‍या को रेखांकित किया गया है कि अयोग्‍य लाभार्थियों को भी इंदिरा आवास योजना के तहत रखा गया था। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के अधीन पूरी सावधनी बरती जाती है और तीन स्‍तर की चयन प्रक्रिया अपनाई जाती है। वर्ष 2016-17 के लिए कुल 44 लाख मकानों को स्‍वीकृति दी गई। सरकार को आशा हैकि इन्‍हें दिसंबर 2017 तक पूरा कर लिया जाएगा। योजना के तहत 6 से 12 महीनों के अंदर निर्माण पूरा कर लेने का लक्ष्‍य निर्धारित किया गया है।Indira-Awaas-Yojana-IAY

  इंदिरा आवास योजना के तहत 36 लाख अधूरे मकानों को पूरा करने पर विशेष ध्‍यान दिया जा रहा है। यह मकान एक से चार वर्ष से लंबित रहे हैं। राज्‍यों से मिली रिपोर्टों के अनुसार 2016-17 में 23.14 लाख मकानों का निर्माण पूरा कर लिया गया है।

    मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान, महाराष्‍ट्र, छत्‍तीसगढ़, कर्नाटक, असम जैसे राज्‍यों ने प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण को क्रियान्वित करने में अग्रणी भूमिका निभाई है। बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्‍तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश, असम, झारखंड,राजस्‍थान और महाराष्‍ट्र ने अधूरे इंदिरा आवास योजना के मकानों को बड़ी संख्‍या में पूरा कर लिया है।

    ग्रामीण विकास विभाग ने आशा व्‍यक्‍त की है कि 2017-।8 में 51 लाख आवास पूरे कर लिए जाएंगे। वर्ष 2017-18 के लिए जल्‍द ही अतिरिक्‍त 33 लाख आवासों को मंजूरी दे दी जाएगी। समान संख्‍या में मकानों को 2018-19 में पूरा करने का प्रस्‍ताव है। 2016-।9 के दौरान 1.35 करोड़ मकान पूरे कर लिए जाएंगे। इस तरह 2022 तक सबके लिए आवास का लक्ष्‍य पूरा होगा।

    एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण योजना का नाम सांसद आदर्श ग्राम योजना (एसएजीवाई) है। इसका उद्देश्‍य ग्रामीण विकास के संबंध में राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी के सपने को पूरा करना है। इसके तहत आदर्श गांवों का निर्माण करना है, जिसके लिए ग्राम पंचायतों को प्रोत्‍सहित किया जाएगा। संसद सदस्‍यों के लिए लक्ष्‍य निर्धारित किया गया है कि वे मार्च 2019 तक तीन आदर्श ग्राम पंचायतों का विकास करें। इसके तहत 2016 तक एक आदर्श ग्राम और 2019 तक दो आदर्श ग्रामों का लक्ष्‍य रखा गया है। इसके बाद 2024 तक प्रति वर्ष की दर से पांच आदर्श ग्रामों को विकसित किया जाएगा।sagy1

   ग्राम पंचायत बुनियादी इकाई होगी, जिसके संबंध में मैदानी क्षेत्रों की आबादी 3000 से 5000 तक और पहाड़ी,जनजातीय और दुर्गम क्षेत्रों की आबादी 1000 से 3000 तक मानक के तौर पर रखी गई है। सांसदों को यह आजादी होगी कि वे आदर्श ग्राम के तहत विकसित की जाने वाली ग्राम पंचायतों को चिन्हित करें। यह ग्राम पंचायत उनके या उनके जीवन साथी के गांव से इतर होनी चाहिए। योजना के तहत ग्राम पंचायतों का आमूल विकास शामिल किया गया है।

     संसद सदस्‍यों ने अब तक 897 ग्राम पंचायतों को गोद लिया है। राज्‍यों में कुल 40,962 परियोजनाओं को पूरा करना है, जिनमें से 21,926 परियोजनाओं को या तो पूरा कर लिया गया है या कार्य प्रगति पर है। कई एसएजीवाई ग्राम पंचायतों के आमूल विकास को हासिल कर लिया गया है। एसएजीवाई के तहत चिन्हित ग्राम पंचायतों के विकास को मौजूदा सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के तहत पूरा करना है जिनके संबंध में कोई अतिरिक्‍त कोष आवंटित नहीं है।

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 *लेखक वरिष्‍ठ स्‍वतंत्र पत्रकार हैं और समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिखते हैं। उन्‍होंने पीटीआई के साथ दो दशकों तक काम किया है।

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