* अंजन रॉयi201751012

भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में पिछले दो वर्षों के दौरान महत्‍वपूर्ण बदलाव आया है और कहा जा सकता है कि इसने हमें एक संवर्द्धित वित्‍तीय वास्‍तविकता प्रदान की है। ये बदलाव मुख्‍य रूप से तीन दिशाओं में हुए हैं, हालांकि इसके साथ साथ कई समानांतर सक्षमकारी विकास भी हुए हैं। इन घटनाक्रमों का संचयी एवं संयुक्‍त प्रभाव आगे आने वर्षों में वित्‍तीय क्षेत्र को मजबूत बनाने में सहायक साबित होगा।

पहला एवं सबसे महत्‍वपूर्ण बदलाव  बैंकिंग क्षेत्र की पहुंच में हुआ विस्‍तार है। प्रत्‍येक वयस्‍क भारतीय, चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कैसी भी रही हो, के लिए बैंक खाते खोलने से संबंधित प्रधानमंत्री की जन धन योजना विश्‍वास से जुड़ा एक कदम था। पहले बैंकिंग क्षेत्र को आम तौर पर केवल ऐसे लोगों का ही विशेषाधिकार समझा जाता था,जिसके पास पैसे हों। बहरहाल, जन धन योजना के तहत, ऐसे लोगों,  जिनके पास कोई स्थिर या आय का नियमित स्रोत नहीं था, या ऐसे लोगों , जिनके पास मानक संदर्भ बिन्‍दुओं में से अधिकतर की कमी थी, को भी बैंक खाते  खोलने की अनुमति दी गई।pmjdy-logo-hi

ये जीरो बैलेंस वाले नए खाते खुद बैंकों के लिए भी लाभदायक साबित हुए। इसकी वजह यह थी कि जैसे ही सरकार ने निर्धनों में से सबसे निर्धन के कल्‍याणकारी लाभों के लिए उनके बैंक खातों में पैसे भेजना शुरु किया, ये बैंक खाते जीरो बैलेंस वाले खाते नहीं रह गए। लाभों के प्रत्‍यक्ष अंतरण से वास्‍तविक लाभार्थियों को निधि का रिसाव रुका जिससे कल्‍याण के वितरण में वास्‍तविक आमूल चूल परिवर्तन देखने में आया। इन खातों की  बड़ी संख्‍या निश्चित रुप से एक समग्र समावेशी प्रणाली के निर्माण में मदद करेगी।

दूसरी बात यह कि, सरकार ने बैंकिंग क्षेत्र के लिए संस्‍थागत संरचनाओं को मजबूत बनाने के लिए भी कदम उठाया है। इस दिशा में दो महत्‍वपूर्ण कदमों का उल्‍लेख किया जा सकता है। पहला है सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के बोर्डों को पेशेवर बनाने पर नया जोर। आज भी, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भारतीय वित्‍तीय प्रणाली की रीढ़ की हड्डी हैं और उनके बोर्डों को पेशेवर बनाने के लिए जितना ज्‍यादा उपाय किए जाएं, उतना ही लाभदायक है।

हम लोगों ने पूर्व में देखा है कि किस प्रकार बैंकों के बोर्डों में वैसे लोगों को शामिल किया जाता था जिनके पास वित्‍तीय क्षेत्र या बैंकिंग क्षेत्र का कोई  भी ज्ञान या कोई भी आवश्‍यक विशेषज्ञता नहीं होती थी। उन लोगों को बैंकों के बोर्डों में केवल इसलिए शामिल किया जाता था क्‍योंकि वे उस वक्‍त के सत्‍तारूढ़ राजनीतिक व्‍यवस्‍था से जुड़े होते थे। हम लोगों ने देखा है कि सरकार अपने नामांकित व्‍यक्तियों को उनके सेवा काल के अंतिम चरणों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बोर्डों में नियुक्‍त कर देती थी। एक मामले में तो, चुनाव आयोग तक को बैंकों के बोर्डों में जल्‍दीबाजी में की गई नियुक्तियों से रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी करना पड़ा था।

चूंकि इनमें से अधिकांश राजनीतिक नियुक्तियां थी, तो ऐसे उदाहरण भी सामने आए थे कि बोर्ड के सदस्‍यों ने ऋण से संबंधित निर्णयों को प्रभावित करने की इच्‍छा जताई थी। ऐसे लोग भी, जो ऋण के हकदार नहीं थे, को बैंक फंड प्राप्‍त हो गया। इसलिए, इसमें आश्‍चर्य की कोई बात नहीं कि इनमें से कई कर्जदार अपना ऋण चुकाने में विफल रहे।

बोर्ड सदस्‍यों के चयन के लिए संस्‍थागत तंत्र के सृजन का परिणाम बैंकों के बोर्डों की मजबूती के रूप में सामने आना चाहिए। चयन समिति से उम्‍मीद है कि वह केवल ऐसे लोगों का चयन करेगी जो योग्‍य हैं और उनके पास आवश्‍यक पेशागत विशेषज्ञता है। बोर्ड के सदस्‍यों  का चयन भी कोई आसान कार्य नहीं है क्‍योंकि सार्वजनिक क्षेत्र के ऐसे ढेर सारे बैंक हैं जिनके बोर्डों को सावधिक रूप से भरा जाता है।

हाल में उठाए गए दूसरे संस्‍थागत कदम का बहुत महत्‍वपूर्ण नीतिगत प्रयोजन है। अभी तक, भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति की रूपरेखा एक निकाय द्वारा बनाई जाती थी जिसकी प्रकृति भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर के लिए मुख्‍य रूप से सलाहकार की होती थी। आखिर में, नीतिगत निर्णय गवर्नर का हुआ करता था बजाये गवर्नर और उनकी नीति परिषद के सामूहिक निर्णय के। भारतीय रिजर्व बैंक की एक उच्‍च स्‍तरीय समिति ने मौद्रिकनीति के आधुनिकीकरण का सुझाव दिया था जो सामूहिक रूप से केंद्रीय बैंक के नीतिगत उद्देश्‍य पर निर्णय ले सके।

इसलिए, मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) गठित की गई और तब से मौद्रिक नीति निर्णय इस समिति के विशेषाधिकार हैं जहां भारतीय रिजर्व बैंक के प्रमुख के अन्‍य सदस्‍यों के साथ साथ मतदान के अधिकार होते हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि अमेरिका या ब्रिटेन जैसे अधिकांश विकसित देशों में मौद्रिक नीति का निर्णय सामूहिक रूप से एक समिति के माध्‍यम से किया जाता है। इससे व्‍यक्ति विशेषों की त्रुटियों या एक ही ढर्रे की सोच की गुंजाइश खत्‍म हो सकती है।

हाल में किया गया एक अन्‍य संस्‍थागत नवोन्‍मेषण दो व्‍यापक तरीके से भारतीय बैंकिंग क्षेत्र विविधता लाया जाना है। पहली बात, अधिकारियों ने नई बैंकिंग कंपनियों की अनुमति दी जिससे जमीनी स्‍तर पर नए विचार, नई कंपनियां एवं प्रतिस्‍पर्धा आई। निजी क्षेत्र की नई कंपनियां अभी अनुभवहीन हैं। लेकिन, निश्चित रूप से उन्‍होंने जमाओं को जुटाने, जोकि अभी तक एक उपेक्षित क्षेत्र रहा था, एवं नई छोटी व्‍यवसाय इकाइयों को फंड देने के मामले में पहले ही गतिशीलता प्रदर्शित करनी शुरु कर दी है।

इस क्षेत्र में दूसरा संस्‍थागत नवोन्‍मेषण विशिष्‍ट बैंकों का समावेश रहा है। उदाहरण के लिए ‘पेमेंट बैंकों’ को लें। कुछ वर्ष पहले तक भी इस प्रकार के बैंक की कल्‍पना भी नहीं की जा सकती थी।

 अंतिम और सबसे हाल में, सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की बढ़ती गैर लाभकारी परिसंपत्तियों के बोझ को खत्‍म करने की दिशा में बेहद गंभीर कदम उठाया है। इस लेख के लिखे जाने तक, उठाए जाने वाले कदमों के विवरणों  के बारे में अभी तक पूरी तरह जानकारी नहीं प्राप्‍त हुई है; लेकिन इसकी रूपरेखा से स्पष्‍ट रूप से सं‍केत मिलते हैं कि इस बार सरकार इस सबसे विवादास्‍पद मामले का समाधान करने के लिए पूरी तरह कृत संकल्‍प है जिसने भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की बुनियाद पर ही खतरा पैदा कर दिया था।

किसी अर्थव्‍यवस्‍था में ऋण का प्रवाह उतना ही महत्‍वपूर्ण है जितना शरीर में रक्‍त प्रवाह। अगर रक्‍त प्रवाह बंद हो जाए तो शरीर की प्रणाली ध्‍वस्‍त हो जाती है। बढ़ती गैर लाभकारी परिसंपत्तियां भी ऐसा ही कर सकती हैं : यह ऋण के प्रवाह को अवरूद्ध कर सकती है। गैर लाभकारी परिसंपत्तियों का अर्थ हुआ आप इन फंडों को प्रवाहित होने से रोक रहे हैं और इससे यह अवरूद्ध मलकुंड में तबदील  हो सकती है। यह कितना खतरनाक हो सकता है, इसका प्रमाण ‘सब प्राइम ऋण संकट’ के अचानक उत्‍पन्‍न हो जाने से प्रदर्शित हुआ था। अवरूद्ध ऋण ने अमेरिकी बैंकों को बुरी तरह प्रभावित कर दिया था। इसके बाद यह संकट 2008 के वैश्विक वित्‍तीय संकट में रूपातंरित हो गया था। वित्‍तीय इतिहास के ये उदाहरण बैंकों की गैर लाभकारी परिसंपत्तियों के मुद्वे के समाधान के महत्‍व को रेखांकित करते हैं। बैंकों के बैलेंस शीट को अनिवार्य रूप से साफ और मजबूत रहना चाहिए; गैर लाभकारी परिसंपत्तियों एवं ऋणों के बढ़ते बोझ से भारग्रस्‍त और रूग्‍ण नहीं होना चाहिए।

हाल के एक अध्‍यादेश के तहत, भारतीय रिजर्व बैंक को अधिकार दिया गया है कि वह एकल बैंकों की गैर लाभकारी परिसंपत्तियों की समस्‍या के समाधान के लिए प्रत्‍यक्ष रूप से हस्‍तक्षेप कर सकता है, यह भविष्‍य के लिए एक बेहद सकारात्‍मक कदम है। अभी तक ऐसा होता रहा था कि इस प्रकार के बैंकों के प्रबंधन डिफॉल्‍ट करने वाली कंपनियों के समूहों पर कोई निर्णयात्‍मक ठोस कार्रवाई करने से परहेज करते रहे थे। बैंक प्रबंधनों के खिलाफ भ्रष्‍टाचार के भविष्‍य के आरोपों का डर उनके खिलाफ कदम न उठाने की प्रमुख वजहों में था क्‍येांकि बुरे कर्जों के किसी भी निपटान में किसी न किसी पर कार्रवाई होनी लाजिमी थी। अब भारतीय रिजर्व बैंक के डिफॉल्‍ट करने वाली कंपनियों के खिलाफ निर्णयात्‍मक भूमिका में आ जाने से बैंकों के प्रबंधन ऐसे बड़े कॉरपोरेट कर्जदारों के खिलाफ कदम उठाने में ज्‍यादा निर्भीक बन जाएंगे।

फिर भी, कितनी भी विशिष्‍ट कार्रवाइयां तब तक सफल नहीं हो सकतीं, जब तक पूरी व्‍यवस्‍था में गंभीरता का एक समग्र वातावरण सृजित नहीं होता कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक अब वास्‍तविक कामकाज के प्रति पूरी तरह संजीदा हैं। खुशकिस्‍मती की बात यह है कि इससे जुड़े कई अन्‍य कदम इसे न्‍यायसंगत ठहराते हैं। इनमें से सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण कदम दिवालियापन के लिए एक कानूनी रूपरेखा का सृजन है। बिना उचित कानूनों के, डिफॉल्‍ट करने वाली कंपनियों के खिलाफ और कई मामलों में जानबूझकर डिफॉल्‍ट करने वाली कंपनियों के खिलाफ मामले वर्षों तक चलते रहते थे। यह डिफॉल्‍ट करने वाली कंपनियों के खिलाफ कदम उठाने का उद्देश्‍य ही पूरी नहीं हो पाता था। अब जब दिवालिया बोर्ड का गठन हो चुका है और कार्रवाई के लिए विशिष्‍ट समय सीमा निर्धारित की जा चुकी है, उम्‍मीद की जा सकती है कि डिफॉल्‍ट करनेवालों तथा बकायों का भुगतान न करने के खिलाफ कानूनी मामलों का त्‍वरित समाधान हो पाएगा।

इन कदमों का अंतिम परिणाम अब यह है कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली के पास अब भविष्‍य में मजबूती से विकसित होने वाला एक सक्षमकारी वातावरण है। ये कब तक फलीभूत होते हैं, अब हमें उसकी प्रतीक्षा रहेगी।

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*लेखक दिल्‍ली में स्थित एक वरिष्‍ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं। वह पहले द इकोनोमिक टाइम्‍स एवं द टेलीग्राफ के साथ काम कर चुके हैं। लेख में व्‍यक्‍त विचार उनके अपने हैं।

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