*सविता वर्मा

संसद ने एचआईवी एवं एड्स संक्रमित लोगों को उपचार कराने एवं उनके प्रति किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकने हेतु समान अधिकार सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण विधेयक पारित किया है। लोकसभा द्वारा इस वर्ष 11 अप्रैल को एवं राज्यसभा द्वारा 21 मार्च को ह्यूमन इम्युनोडेफिसिएंसी वायरस (एचआईवी) एवं एक्वॉर्ड इम्युन डेफिसिएंसी सिंड्रम-एड्स (रोकथाम एवं नियंत्रण) विधेयक, 2017 पारित किया गया।

 भारत में एचआईवी संक्रमण पहली बार 1986 में चेन्नई में महिला सेक्स वर्करों के बीच पाया गया। हालांकि पिछले दशक के दौरान एचआईवी की व्याप्ति में लगातार कमी आती जा रही है, फिर भी भारत अभी भी दक्षिण अफ्रीका एवं नाइजीरिया के बाद दुनिया में एचआईवी महामारी से ग्रसित तीसरा सबसे बड़ा देश है। भारत में अभी हाल में पारित किया गया एचआईवी विधेयक दक्षिण एशिया में अपनी तरह का पहला विधेयक है। दक्षिण अफ्रीका एवं नाइजीरिया ने भी भेदभाव के कुछ रूपों को प्रतिबंधित करते हुए कानून पारित किए हैं। भारत में एचआईवी से ग्रसित लोगों की अनुमानित संख्या लगभग 21 लाख है। भारत में 2015 में लगभग 86 हजार नए एचआईवी संक्रमण दर्ज किए गए जो कि वर्ष 2000 की तुलना में 66 प्रतिशत गिरावट को प्रदर्शित करता है। 2015 में एड्स से संबंधित बीमारियों से लगभग 68 हजार लोगों की मौत हुई। यह विधेयक नए संक्रमणों पर अंकुश लगाते हुए राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम को समर्थऩ देगा एवं 2030 तक इस महामारी को समाप्त करने के सतत विकास लक्ष्य अर्जित करने में मदद करेगा।p1bdittoa016d919gu2nf75i114j4

देश में ऐसे कानून की आवश्यकता के पीछे एक मुख्य वजह यह थी कि एचआईवी/एड्स को एक प्रकार के सामाजिक कलंक एवं भेदभाव की दृष्टि से देखा जाता है। हालांकि सरकार के प्रयासों एवं सिविल सोसायटी के योगदान की वजह से इस भेदभाव में बहुत कमी आई है पर अभी भी यह भेदभाव बना हुआ है। नया कानून इस भेदभाव को समाप्त करने में काफी कारगर साबित होगा। यह विधेयक भेदभाव की व्याख्या रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं, अचल संपत्ति को किराये पर देने या वहां निवास करने, सार्वजनिक या निजी कार्यालय, बीमा एवं सार्वजनिक सुविधाओं की मनाही या इन्हें समाप्त करने के रूप में करता है। सरकार या किसी व्यक्ति द्वारा इन वर्गों में से किसी में भी अनुचित बर्ताव को भेदभाव माना जाएगा और उस पर कार्रवाई हो सकती है।aidsapakabardunia

विधेयक में कहा गया है कि रोजगार प्राप्त करने, स्वास्थ्य देखभाल या शिक्षा की सुविधा प्राप्त करने के लिए किसी का भी एचआईवी परीक्षण एक पूर्व आवश्यकता के रूप में नहीं किया जा सकता। यह किसी भी व्यक्ति द्वारा एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों के खिलाफ सूचनाओं के प्रकाशन या नफरत की भावनाएं फैलाने को प्रतिबंधित करता है। गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए, यह विधेयक बिना सूचित सहमति के एचआईवी परीक्षण या चिकित्सा उपचार को प्रतिबंधित करता है। बहरहाल, सूचित सहमति में लाईसेंस प्राप्त ब्लड बैंकों द्वारा जांच, चिकित्सा अनुसंधान या कोई ऐसा उद्देश्य जहां परीक्षण गुमनाम हो और उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति की एचआईवी स्थिति को निर्धारित करना ना हो, शामिल नहीं है। किसी एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को उसकी एचआईवी स्थिति का खुलासा करने की आवश्यकता तभी पड़ेगी, जब उसके लिए न्यायालय का आदेश हो।

भेदभाव करने तथा गोपनीयता का उल्लंघन करने पर दंड के भी प्रावधान हैं। स्वास्थ्य मंत्री श्री जे.पी.नड्डा ने कहा “जो कोई विधेयक के प्रावधानों का अनुपालन नहीं करेगा, उसे दंडित किया जाएगा। ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ दीवानी एवं आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।” जो कोई विधेयक के कार्यान्वयन को रोकने का प्रयास करेगा, उसके खिलाफ भी कदम उठाए जाएंगे।

एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों की गोपनीयता का उल्लंघन करने पर दो वर्ष तक की कैद और एक लाख रूपये तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।

हालांकि एड्स का उपचार या एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी वर्तमान में सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क है। इस विधेयक में संक्रमित लोगों के उपचार को एक कानूनी अधिकार माना गया है। इसमें कहा गया है कि, “सरकार की देखभाल और संरक्षण में प्रत्येक व्यक्ति के पास एचआईवी की रोकथाम, जांच, उपचार एवं परामर्शी सेवाओं को पाने का अधिकार होगा।” इसलिए, केंद्र एवं राज्य सरकारें संक्रमण प्रबंधन सेवाओं के साथ-साथ एड्स एवं अवसरजनित संक्रमणों के लिए उपचार उपलब्ध कराएंगी। केंद्र एवं राज्य सरकारें एचआईवी एवं एड्स के प्रचार को रोकने के लिए भी कदम उठाएंगी तथा एचआईवी या एड्स संक्रमित व्यक्तियों, विशेष रूप से महिलाओं एवं बच्चों तक कल्याणकारी योजनाओं की सुविधाएं उपलब्ध कराने में भी सहायता करेंगी। सरकार ने पिछले वर्ष एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी पर 2 हजार करोड़ रूपये व्यय किए हैं।

ह्यूमन इम्युनोडेफिसिएंसी वायरस (एचआईवी) एवं एक्वार्ड इम्युन डेफिसिएंसी सिंड्रम-एड्स (रोकथाम एवं नियंत्रण) विधेयक, 2014 राज्यसभा में 11 फरवरी, 2014 को तत्कालीन स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री गुलाम नबी आजाद द्वारा पेश किया गया था। इस विधेयक के संशोधन वर्तमान सरकार द्वारा पिछले वर्ष जुलाई में पेश किए गए थे। तब से मूल विधेयक में कई परिवर्तन किए जा चुके हैं। उदाहरण के लिए विधेयक ने “परीक्षण एवं उपचार” नीति अंगीकार किया है जिसका अर्थ यह है कि कोई भी संक्रमित व्यक्ति राज्य एवं केंद्र सरकार द्वारा निःशुल्क उपचार का हकदार होगा।

हाल में पारित विधेयक में एचआईवी संक्रमित व्यक्ति के संपदा अधिकारों के प्रावधान है। 18 वर्ष से कम उम्र के प्रत्येक एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को एक साझा परिवार में रहने का तथा परिवार की सुविधाओं का आनंद उठाने का अधिकार है। इसमें यह भी कहा गया है कि एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों से संबंधित मामलों का निपटान न्यायालयों द्वारा प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा। अगर कोई भी एचआईवी संक्रमित या प्रभावित व्यक्ति किसी कानूनी कार्रवाई में एक पक्षकार है तो न्यायालय आदेश पारित कर सकता है कि कार्रवाई का संचालन व्यक्ति की पहचान को गुप्त रखकर, बंद कमरे में किया जाए तथा किसी भी व्यक्ति को वैसी सूचना प्रकाशित करने से रोका जाए जो आवेदक की पहचान का खुलासा करता है। एचआईवी संक्रमित या प्रभावित किसी भी व्यक्ति द्वारा दायर रखरखाव आवेदन के संबंध में कोई भी आदेश पारित करते समय न्यायालय आवेदक द्वारा उठाए जाने वाले चिकित्सा व्ययों पर विचार करेगा।naco_update

विधेयक में प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा अधिनियम एवं स्वास्थ्य देखभाल सेवाओँ के प्रावधान के उल्लंघन से संबंधित शिकायतों की जांच करने के लिए लोकपाल की नियुक्ति किए जाने की आवश्यकता व्यक्त की गयी है। लोकपाल प्राप्त आवेदनों की संख्या औऱ प्रकृति तथा की गयी कार्रवाई और पारित किए गए आदेशों के विवरण समेत प्रत्येक 6 महीने पर राज्य सरकार को एक रिपोर्ट पेश करेगा। अगर लोकपाल के आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है तो 10 हजार रूपये के आर्थिक दंड का भी प्रावधान है।

विधेयक के प्रारूप के निर्माण की प्रक्रिया 2002 में आरंभ हुई जब सिविल सोसायटी के सदस्यों, एचआईवी संक्रमित लोगों और सरकार द्वारा एक कानून बनाए जाने की आवश्यकता महसूस की गयी। यह विधेयक एक गैर-सरकारी संगठन लॉयर्स क्लेक्टिव की पहल है। यह 2006 में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एनएसओ) को प्रस्तुत किया गया था। इस विधेयक का प्रारूप एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों, सेक्स वर्करों, समलैंगिकों, ट्रांसजैंडरों एवं नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करने वालों, स्वास्थ्य कर्मचारियों, शिशु संगठनों, महिलाओं के समूहों, ट्रेड यूनियनों, वकीलों एवं राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटियों समेत हितधारकों के साथ राष्ट्रव्यापी सलाह मशविरों के बाद बनाया गया था।

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*लेखिका 18 वर्षों से अधिक अनुभव रखने वाली एक वरिष्ठ विज्ञान एवं स्वास्थ्य पत्रकार है। अब वह एक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं और इससे पहले पीटीआई और कुछ अन्य बड़े समाचार पत्रों में काम कर चुकी हैं।

 

इस लेख में व्‍यक्‍त विचार उनके निजी विचार हैं।

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